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1500-Year-Old Mahalaxmi Idol Mystery Explained

Last Updated:November 15, 2025, 13:36 IST

Mahalaxmi Idol Mystery: पाली के खैरवा में स्थित 1500 साल पुरानी महालक्ष्मी मूर्ति दिन में तीन बार अलग-अलग भाव दिखाती है. कभी हँसी, कभी गंभीर, कभी शांत. इस अद्भुत रहस्य ने भक्तों और विशेषज्ञों दोनों को हैरान कर रखा है. काले पत्थर की यह दुर्लभ मूर्ति सदियों से आस्था का केंद्र बनी हुई है.पाली

पाली ज़िले में आने वाले खैरवा में स्थित करीब 1500 साल पुरानी महालक्ष्मी की मूर्ति के दर्शन हम आपको करवाएंगे. सोने-चांदी के आभूषणों से शृंगारित काले पत्थर से बनी सवा दो फीट की यह मूर्ति कमल पर विराजी हैं. मान्यता है कि यह मूर्ति महाराष्ट्र के कोल्हापुर में सिंह पर विराजी महालक्ष्मी जैसी है. ग्रामीणों का कहना है कि माता की मूर्ति दिन में तीन बार स्वरूप बदलती हैं. सुबह, दोपहर और शाम की पूजा अर्चना में थोड़ा अलग रूप दिखता है, जो इस प्राचीन मंदिर की एक खास विशेषता है.

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मंदिर की मूर्ति की स्थापना को लेकर पुजारी के पूर्वज बताते थे कि यह मूर्ति भीनमाल से एक बैल वाली बैलगाड़ी (वैल) द्वारा लाई गई थी. कहा जाता है कि मूर्ति मंदिर से भी पुरानी है. लोकमान्यता के अनुसार, जब मुगलों का अत्याचार बढ़ रहा था और मंदिरों को तोड़ा जा रहा था, तब माता ने तत्कालीन पुजारी को स्वप्न में आकर कहा था कि मेरी मूर्ति को वैल से ले जाओ और जहाँ पर वैल का पहिया थम जाए, वहीं मंदिर की स्थापना कर देना. भीनमाल से लाई गई वैल शाम होते-होते यहीं खैरवा की ब्रह्मपुरी में रुक गई और मूर्ति की स्थापना कर दी गई. हालांकि, पुजारी दयालदास वैष्णव बताते हैं कि मंदिर के स्थापना को लेकर कोई मूल प्रमाण नहीं है और यहाँ के राव के एक हज़ार साल पुराने चोपड़े में भी इसका इतिहास नहीं मिलता है. अब इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार किया जा रहा है.

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खैरवा स्थित महालक्ष्मी की चार हाथों वाली मूर्ति के सिर पर स्वर्ण मुकुट है. विशेष दिनों में माँ को बहुमूल्य सोने के गहनों से सजाया जाता है. माता जी के दो किलो से ज़्यादा चांदी के गहने हैं. श्रृंगार में गले में सोने का नवलखा तिमानिया हार और चेन, कुंडल, मुकुट, सिर पर हीरा लगी हुई आड, और नाक की नथ के तीन अलग-अलग पीस शामिल हैं. ये सभी आभूषण चांदी के भी बने हुए हैं. इसके अतिरिक्त, चांदी की काचली, चार छत्र, कुंडल, मुकुट, चाकू, चक्र, हाथी, कलश, तीन चूड़ा और चांदी की खड़ाऊ भी श्रृंगार में उपयोग होते हैं, जो माता के दिव्य स्वरूप को और भी भव्य बना देते हैं.

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महेश प्रसाद अवस्थी बताते हैं कि खैरवा महालक्ष्मी मंदिर में हर वर्ष श्राद्ध पक्ष की अष्टमी को बनने वाला विशेष भोग बिना पानी के बनता है. साल में एक बार अष्टमी के दिन हलवा, पूड़ी, खीर, खांड, घृत और दाल-भात जैसे पकवान बनाए जाते हैं. इन पकवानों को बनाने की प्रक्रिया विशेष होती है—पूड़ी बनाने के लिए आटे को दूध के साथ गूंथा जाता है और उसे शुद्ध देसी घी में ही तला जाता है. यह प्रसाद बनने के बाद, रात को ठीक 12 बजे माता को भोग लगता है, जो इस मंदिर की एक अनूठी और प्राचीन परंपरा है.

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स्थानीय निवासी जगदीश त्रिवेदी बताते हैं कि इस मंदिर में होली के दिन प्रसाद की ऑनलाइन बोली लगती है, जो एक अनूठी परंपरा है. एक और महत्वपूर्ण मान्यता यह है कि मंदिर के पुजारियों के पूर्वज को एक बार माता दर्शन ज़रूर देती हैं. ऐसा दावा है कि प्रभु कुम्हार के पिता वेनाराम कुम्हार को माताजी ने निजी मंदिर में कन्या के रूप में दर्शन दिए थे. पुजारी बताते हैं कि नवरात्रि में पहले पुजारी मांगीलाल को परचा मिला था. वे जब मंदिर में पूजा कर रहे थे, तब सजी-धजी महिला मंदिर से बाहर आती हैं और थोड़ी देर बाद मंदिर में ओझल हो जाती हैं. दर्शन पर वह डरकर बाहर भाग आए, पर बाद में ज्ञात हुआ कि माता ने उन्हें पर्चा (चमत्कार का अनुभव) दिया था.

First Published :

November 15, 2025, 13:28 IST

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1500 साल पुरानी महालक्ष्मी मूर्ति का चमत्कार! दिन में तीन बार बदलती है रूप!

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