प्रेशर, बुलिंग और अकेलापन, शिक्षा के मंदिर में टूटने लगे सपने, दिल्ली और जयपुर में हुई इन मौतों का जिम्मेदार कौन?

नई दिल्ली (School Education). जब एक बच्चा अपने स्कूल बैग में किताबें और दिल में अनगिनत सपने लेकर घर से निकलता है तो माता-पिता का विश्वास होता है कि वह ज्ञान के सुरक्षित आंगन में जा रहा है. मगर हाल ही में दिल्ली और जयपुर से आईं दो दिल तोड़ने वाली खबरों ने यह भरोसा तोड़ दिया. राजेंद्र नगर मेट्रो स्टेशन पर 15 वर्षीय छात्र का अंतिम कदम और जयपुर की छात्रा अमायरा की आत्महत्या- ये केवल खबरें नहीं हैं.. ये हमारी शिक्षा प्रणाली के भीतर सिसकते बचपन की चीखें हैं.
इन मासूम जिंदगियों ने अत्यधिक दबाव, शिक्षकों की प्रताड़ना और स्कूल की असंवेदनशीलता के सामने हार मान ली. यह त्रासदी हमें बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर करती है. आखिर क्यों ‘शिक्षा के मंदिर’ अब कुछ बच्चों के लिए मानसिक यातना का केंद्र बन रहे हैं? इन दर्दनाक घटनाओं के केंद्र में सुसाइड नोट्स और परिजनों के चीखते हुए आरोप हैं, जो सीधे तौर पर उन शिक्षकों और स्कूल प्रशासकों की तरफ इशारा करते हैं, जिन पर बच्चों के भविष्य को संवारने की जिम्मेदारी थी.
सिसकियों में टूट गया बचपन
जब कोई छात्र अपनी आखिरी सांस में स्कूल को अपनी पीड़ा का कारण बताता है तो यह पूरी व्यवस्था के लिए शर्मनाक है. इससे पता चलता है कि ग्रेड्स की दौड़ में हमने बच्चों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को पीछे छोड़ दिया है. ये आत्महत्याएं सिर्फ आंकड़ा मात्र नहीं हैं. ये उस मौन महामारी का सबूत हैं, जिसने हमारे बच्चों के कॉन्फिडेंस और जीने की इच्छा को निगल लिया है. अब समय आ गया है कि शिक्षा को परिणामों से ऊपर उठाकर संवेदनशीलता और सुरक्षा का पर्याय बनाया जाए.
बदल गया स्कूलों का कल्चर
पहले स्कूल शिक्षा का मंदिर और शिक्षक गुरु कहलाते थे. लेकिन वक्त के साथ इनकी परिभाषाएं बदल गई हैं. पिछले कुछ सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों में हुईं कई घटनाओं ने शिक्षा प्रणाली और स्कूलों के वातावरण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. इन मामलों ने यह कड़वी सच्चाई सामने ला दी है कि एकेडमिक सफलता का अत्यधिक दबाव और शिक्षकों का असंवेदनशील व्यवहार किस हद तक बच्चों को भावनात्मक रूप से तोड़ सकता है. ये दुखद घटनाएं केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक त्रासदी नहीं हैं, बल्कि सामाजिक संकट हैं.ॉ
स्कूल में परेशान थे दोनों बच्चे
दोनों ही मामलों में, चाहे वह दिल्ली के 10वीं कक्षा के छात्र का मामला हो या जयपुर की छात्रा अमायरा का, सुसाइड नोट और परिजनों के बयानों में सीधे तौर पर स्कूल प्रशासन और शिक्षकों पर मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया गया है. यह आरोप शिक्षा संस्थानों की नैतिक जिम्मेदारी पर सवाल खड़ा करता है. एक तरफ जहां स्कूल छात्रों को भविष्य के लिए तैयार करने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्हीं के कैंपस में बच्चे असुरक्षित और मानसिक दबाव महसूस कर रहे हैं.
मामला जानकर फूट पड़ेगा कलेजा
दो अलग-अलग शहरों की इन घटनाओं में दुखद समानताएं हैं- स्कूल और शिक्षकों पर मानसिक प्रताड़ना का आरोप और उसके परिणाम में उठाया गया अंतिम कदम.
केस 1- दिल्ली: राजेंद्र नगर मेट्रो स्टेशन पर छात्र की आत्महत्या
यह दुखद घटना दिल्ली के राजेंद्र नगर मेट्रो स्टेशन पर हुई, जहां 15 वर्षीय स्कूली छात्र ने आत्महत्या कर ली. मृतक के पिता ने मीडिया के सामने स्पष्ट आरोप लगाया कि छात्र ने यह कदम स्कूल प्रशासन और शिक्षकों की प्रताड़ना से तंग आकर उठाया. उन्होंने बताया कि शिक्षक छात्र को लगातार अपमानित करते थे. पुलिस को एक सुसाइड नोट मिला है, जिसमें छात्र ने स्पष्ट रूप से इस प्रताड़ना और स्कूल के व्यवहार का जिक्र किया है. पुलिस ने आरोपों के आधार पर मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.
केस 2- जयपुर: नीरजा मोदी स्कूल में छात्रा अमायरा की आत्महत्या
यह घटना जयपुर के प्रतिष्ठित नीरजा मोदी स्कूल से जुड़ी है, जहां छात्रा अमायरा ने आत्महत्या जैसा गंभीर कदम उठाया. इस मामले में भी परिजनों ने स्कूल प्रशासन और शिक्षकों के कठोर व्यवहार को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया. परिजनों ने स्कूल पर मानसिक उत्पीड़न और छात्रों को पर्याप्त इमोशनल सपोर्ट न देने का आरोप लगाया. इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कैसे निजी स्कूलों में भी छात्रों को मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर अकेला छोड़ दिया जाता है.
ऐसी घटनाएं रोकने के लिए बनाए गए हैं कठोर नियम
शिक्षा निकाय और सरकारें स्कूलों के लिए अपनी नीतियों की समीक्षा करती रहती हैं. छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई जरूरी कदम उठाए हैं:
1. उत्पीड़न विरोधी नीति (Anti-Harassment Policy)
सख्त नियम: स्कूलों में शिक्षकों या स्टाफ द्वारा छात्रों के शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न को रोकने के लिए सख्त नीतियां लागू की गई हैं. उल्लंघन करने पर तुरंत निलंबन और कानूनी कार्रवाई का प्रावधान किया गया है.
गोपनीय शिकायत तंत्र: हर स्कूल में एक ऐसा गोपनीय शिकायत निवारण तंत्र होना अनिवार्य किया गया है, जहां छात्र या अभिभावक बिना किसी डर के प्रताड़ना की शिकायत दर्ज करा सकें.
2. मेंटल हेल्थ के लिए अनिवार्य सहायता
काउंसलर की नियुक्ति: सीबीएसई और राज्य सरकारों के निर्देशों के अनुसार, सभी स्कूलों में नियमित और प्रशिक्षित मेंटल हेल्थ काउंसलर की नियुक्ति अनिवार्य है. इनका काम एकेडमिक प्रेशर से जूझ रहे छात्रों को नियमित रूप से सहायता प्रदान करना है.
शिक्षकों की ट्रेनिंग: शिक्षकों को छात्रों में डिप्रेशन और तनाव के शुरुआती लक्षणों को पहचानने और उनसे संवेदनशीलता (Sensitivity) के साथ निपटने के लिए अनिवार्य प्रशिक्षण दिया जा रहा है.
3. एकेडमिक प्रेशर कम करना
आसान निकास नीति (Exit Policy): प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी वाले संस्थानों और स्कूलों में प्रदर्शन के आधार पर छात्रों को अपमानित करने या निकालने पर रोक लगाई गई है.
रैंक पब्लिक न करना: कई राज्यों ने कोचिंग संस्थानों को छात्रों की रैंक या स्कोर को पब्लिक रूप से डिसप्ले करने से रोका है. इससे तुलना और प्रतिस्पर्धा का दबाव कम हो सकेगा.
इन नियमों से यह सुनिश्चित किया जाता है कि स्कूल छात्रों के लिए उपलब्धि का नहीं, बल्कि सुरक्षा और कुछ सीखने का केंद्र बनें.
छात्र हों, किसान या गृहिणी हों, कोई भी व्यक्ति सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर 14416 पर कॉल कर मदद ले सकते हैं. अगर किसी में आपको तनाव या अवसाद के लक्षण दिखाई देते हैं, तो उसको मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक तक पहुंचाने में मदद करें. ये परिवार के साथ ही सामाजिक जिम्मेदारी भी है. तभी ऐसी घटनाओं को रोका जा सकेगा.



