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Tuesday , 24 March 2020 [prisna-bing-website-translator]
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चाय के प्याले का ऐसा तुफान आया कि मोदी को पलकों में बैठाने के साथ कांग्रेस को नेता प्रतिपक्ष लायक भी नहीं छोड़ा

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दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पिछले दिनों लोकसभा चुनाव प्रचार के बीच चाय के प्याले ने जो तुफान खड़ा किया,देश की जनता के दिए जनादेश के साथ वह भी थम गया और इतिहास में पहली बार सड़क के आदमी पर भरोसा करके देश ने उसे प्रचण्ड बहुमत से पांच साल के लिए कमान सौप दी। देश में सत्तारूढ़ कांग्रेस की यह स्थिति हो गई कि वह लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद हासिल करने के आंकड़े को भी नहीं छू सकी। 
चाय बेचने वाले पर कटक्ष भी बहुत हुए,लेकिन जिस निर्भयता और आत्मविश्वास की बदौलत मोदी को आशातित से ज्यादा परिणाम मिला,उसे बरकरार रखने की चुनौति भी इस जनादेश के साथ मिला। सत्ता में इस तरह का बहुमत भाजपा को कभी नहीं मिला। आजादी के बाद गवाह है सियासत की गलियां,जहां पार्टी कई बार उखड़ी,डगमगाई,देश भर में जनाधार महज दो सीटों तक सिमट कर रह गया। भाजपा के चहेते अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोकप्रिय व्यक्ति भी इस जनाधार से अचंभित हुए बिना नहीं रह सकते। भाजपा का हर छोटा-बड़ा कार्यकर्ता अभिभूत है,जनता जर्नादन के फैसले से,लेकिन सत्ता संभालने के साथ जिस ध्येय के बूते मोदी ने सत्ता हासिल की है,उसे नहीं भूलना चाहिए। देश की सवा सौ करोड़ जनता मोदी के साथ खड़ी देश को विकास की नई दिशा देने को बेताब मोदी की कार्यशैली का कायल होना चाहती है। उसे भरौसा है कि उनका मोदी ऐसा कुछ नहीं करेगा,जिसके बूते कथनी और करनी में फर्क की कहावत चरितार्थ हो।
साबरमती से वाराणसी के घाट ले लो या फिर देश का कोई भी कोना,हर जगह मोदी से अपेक्षा की जा रही है। सच भी है कि देश की आजादी के बाद जिस स्वराज की कल्पना महात्मा गांधी आदि ने की थी,उसे लेकर सवाल खड़े करते हुए मोदी ने सही मायने में अब स्वराज लाने की बात कही है। कांग्रेस ने 60 साल में क्या किया,यह बीते कल की बात है,लेकिन अब बात यह है कि मोदी अपने सपने की सोच लेकर देश को क्या नया देंगे,जिससे हर हर मोदी,घर घर मोदी की सार्थकता साबित हो सकें,अन्यथा तो देश के लोकतंत्र में नेताओं के थौथले वादों के भ्रमजाल में फंसकर जिस तरह से देश की आवाम पिसती आई है आगे भी वहीं होगा,लेकिन फर्क इतना होगा कि जिस तरह आज कांग्रेस को जनादेश के बल पर अश्क से फर्श का सामना करना पड़ा है वहीं मोदी को करना पड़े। आज मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सरकार की चाकरी में लगी ब्यूरोकेसी वहीं है जो कांग्रेस के साथ थी,महज जनादेश के साथ उसके स्वर बदले है,लेकिन जिन मुद्दो को लेकर मोदी ने चुनाव लड़ा,उसके लिए ब्यूरोकेसी भी उतनी ही जिम्मेदार है,जितना निर्वाचित सरकार। अब ऐसे में मोदी किस तरह देश को नए आयाम देते है, या फिर सिस्टम का हिस्सा बन कर रह जाते हैं। कुल मिलाकर मोदी नेे जिस तरह से देश में जनादेश पलटने में महारत हासिल की है,उसी तरह की सफलता ब्यूरोकेसी के बीच मिल गई तो बात बन सकती है,देश ही नहीं बल्कि भारत को लेकर दुनियाभर में सिस्टम बदल सकता है।
आज मोदी की प्रधानमंत्री की सार्थकता सिद्ध होने के बाद ओबामा के साथ दुनियाभर से मोदी को बधाई के साथ निमंत्रण मिल रहे हैं,यह वही मोदी है,जिन्हें अमेरिका ने वीसा नहीं दिया। आज जिन्होंने नकारा देश की जनता से मिले जनादेश के बूते वहीं लोग मोदी को गले लगाने को बेकरार है। ऐसे में मोदी की विदेश नीति क्या होगी,यह तो मोदी के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद बनने वाली केन्द्र सरकार और मोदी पालिसी पर निर्भर होगा,क्योंकि साफ है मोदी ने देश की आजादी नहीं देखी,लेकिन साधारण परिवार में जन्म लेकर वह सघर्ष जरूर किया और देखा है जो आवाम को पिछले साठ साल से दीमक की तरह चाट रहा था। देश के कायाकल्प के साथ नए स्वराज की शुरूआत आजादी के बाद के लोगों के माध्यम से हो रही है अच्छी बात है, गर्व है महात्मा गांधी के गृहराज्य से उठे तुफान ने ऐसी सुनामी का रूप धरा जिस में कई दिग्गज ही धराशायी नहीं हुए बल्कि वह पार्टी भी इस कदर धराशायी हो गई जो आज तक महात्मागांधी के नाम पर पीढ़ी दर पीढ़ी सत्तासुख भोगती आ रही थी,वंशवाद की इस बेल का ऐसा अंत जनादेश के माध्यम से कभी नहीं देखा,स्थिति यह आ गई कि देश में सबसे लम्बे समय तक शासन की बागड़ोर संभालने वाली पार्टी कांग्रेस (आई) इस दयनीय स्थिति में है कि आंकड़ो की गणित के आधार पर वह लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का दावा भी पेश नहीं कर सकती। जनादेश ने उसे आत्मसात करने के लिए पांच साल दे दिए तो मोदी पर विश्वास करके पूदे देश की चाबी सौप दी गई है। अब देखना यह है कि मोदी जनता के विश्वास पर खरा उतरते हैं या फिर कांग्रेस आत्मसात करने के साथ पांच साल में जनता को भरोसे में लेने में सफल होती है।

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