करौली में दिवाली पर पशुधन पूजन और गहनों की अनोखी परंपरा.

Last Updated:October 21, 2025, 15:58 IST
राजस्थान की करौली नगरी में दिवाली सिर्फ इंसानों का नहीं, बल्कि दुधारू पशुओं का भी खास त्योहार होता है. यहां सदियों पुरानी परंपरा के तहत गाय-भैंसों को गहनों से सजाकर पूजा की जाती है. करौली के बाजारों में दिवाली से पहले करोड़ों के पशु-आभूषण बिकते हैं और तीन दिन तक बाजारों में खास रौनक रहती है. यह परंपरा किसानों के पशुओं के प्रति प्रेम और आस्था का प्रतीक है.
राजस्थान की धार्मिक नगरी करौली में दिवाली सिर्फ इंसानों की खुशियों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यहां गाय-भैंस जैसे दुधारू पशुओं के लिए भी यह पर्व किसी बड़े त्योहार से कम नहीं होता. दीपावली और गोवर्धन पूजा के अवसर पर यहां पशुधन पूजन की एक अनोखी परंपरा सदियों से चली आ रही है.

इसी परंपरा के चलते करौली शहर का बड़ा बाजार और अनाज मंडी बाजार दिवाली से पहले ही पशुओं के गहनों से जगमगाने लगते हैं. इन बाजारों में लाखों नहीं बल्कि करोड़ों रुपए के पशु आभूषण बिकते हैं.

ग्रामीण क्षेत्रों के लोग अपने दुधारू पशुओं खासकर गाय, भैंस और बछड़ों के श्रृंगार के लिए इन गहनों को खरीदने में खासा उत्साह दिखाते हैं. धनतेरस से लेकर गोवर्धन पूजा तक तीन दिन इन बाजारों में जमकर रौनक रहती है.

करौली के व्यापारी विक्की गुप्ता बताते हैं कि यहां दिवाली पर गौ पूजन का विशेष महत्व है. ग्रामीण लोग मानते हैं कि दुधारू पशुओं की पूजा और श्रृंगार करने से न सिर्फ उनकी उत्पादकता बढ़ती है, बल्कि घर में लक्ष्मी का वास भी होता है. यही कारण है कि हर किसान दिवाली पर अपने पशुओं को नए गहनों से सजाता है और उनकी सेवा करता है.

व्यापारी बताते हैं कि करौली के बाजारों में बिकने वाले यह गहने मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले से बनकर आते हैं. इनमें चीपगंडा, पाटिया, घंटी, माला, घुंगरू माला, सूत की डोर और रंग-बिरंगे रस्से जैसे आभूषण शामिल होते हैं. इनकी कीमत ₹10 से लेकर ₹1000 तक होती है.

दीपावली पर करौली के बाजारों में पशुधन के इन गहनों की बिक्री तीन दिनों तक चरम पर रहती है. इस दौरान गांवों से आए किसान अपने पशुओं के लिए गहनों की खरीदारी करते हैं. पूरा बाजार रंग-बिरंगी रस्सियों, चमकदार घंटियों और माला से सजा दिखाई देता है, जिससे ऐसा लगता है जैसे करौली की दिवाली सचमुच हर जीव की दिवाली हो.

करौली में दिवाली पर पशुधन पूजन केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि किसान और उनके पशुओं के बीच प्रेम और आस्था का प्रतीक है. दुधारू पशुओं को सजाने-संवारने की यह परंपरा आज भी यहां पूरे हर्षोल्लास के साथ निभाई जाती है.
First Published :
October 21, 2025, 15:58 IST
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करौली में दिवाली पर पशुधन पूजन और गहनों की है अनोखी परंपरा



