Agriculture Tips : एक बीघे में लाखों की कमाई… सरसों की इन नई किस्मों ने राजस्थान के किसानों की किस्मत बदल दी!

पाली. आधुनिक तकनीक की क्रांति अब खेतों तक पहुंच चुकी है. ऐसे में कई तरह की उन्नत फसलों की खेती की जा रही है. लेकिन अगर बात सरसों की करें तो यह भारत की प्रमुख तिलहन फसल है, जिसे रबी के मौसम में उगाया जाता है. यह एक ऐसी फसल है जो कम लागत में अधिक लाभ देती है और किसानों को बेहतर आमदनी का साधन बनती है. राजस्थान के कई जिलों में इसका अच्छा उत्पादन होता है, लेकिन किसानों के लिए यह समझना जरूरी है कि सही तकनीक और उन्नत किस्मों के चयन से पैदावार को कैसे बढ़ाया जा सकता है.
डीआरएमआर 150-35 भारतीय सरसों की प्रमुख किस्मों में से एक है. इसकी पैदावार क्षमता 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. इसमें तेल की मात्रा लगभग 39.8 प्रतिशत होती है. पौधे की ऊंचाई 164 से 186 सेंटीमीटर होती है और परिपक्वता अवधि लगभग 114 दिन की होती है.
डीआरएमआर 1165-40 रुक्मणी एक उन्नत किस्म है, जिसकी पौधे की ऊंचाई 177 से 196 सेंटीमीटर तक होती है. इसकी उत्पादन क्षमता 22 से 26 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक रहती है. इसमें तेल की मात्रा 40 से 42.5 प्रतिशत तक होती है और यह फसल 135 से 151 दिनों में तैयार हो जाती है. यह किस्म सिंचित और असिंचित दोनों परिस्थितियों में बेहतर परिणाम देती है.
डीआरएमआरआईसी 16-38 बृजराज किस्म सिंचित क्षेत्रों में देर से बुवाई के लिए उपयुक्त है. इसकी ऊंचाई 188 से 197 सेंटीमीटर होती है. यह किस्म 120 से 149 दिनों में परिपक्व हो जाती है और इसमें तेल की मात्रा 37.6 से 40.9 प्रतिशत तक होती है. इसकी उत्पादन क्षमता 16 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.
डीआरएमआरआईजे-31 गिरिराज सरसों की एक प्रमाणित और उन्नत किस्म है. इसमें तेल की मात्रा 39 से 42.6 प्रतिशत तक होती है और पैदावार क्षमता 23 से 28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक रहती है. इसके पौधे की ऊंचाई 180 से 210 सेंटीमीटर होती है और परिपक्वता अवधि 137 से 153 दिन की होती है.
डीआरएमआर 2017-18 राधिका किस्म सिंचित परिस्थितियों में देर से बुवाई के लिए उपयुक्त है. इसकी औसत उत्पादन क्षमता 1788 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है. बीज में तेल की मात्रा 40.7 प्रतिशत तक होती है. इसकी परिपक्वता अवधि 120 से 150 दिन की है. यह किस्म कई प्रमुख बीमारियों जैसे अल्टरनेरिया पत्ती झुलसा, सफेद जंग, तना सड़न और फफूंद जनित रोगों के प्रति अधिक प्रतिरोधक है.
सिंचाई और फसल प्रबंधन की रणनीतिअगर वर्षा पर्याप्त हो तो सरसों की फसल को अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती. लेकिन जल की कमी होने पर कम से कम दो सिंचाई करनी चाहिए. पहली सिंचाई बुवाई के 30 से 40 दिन बाद और दूसरी सिंचाई 70 से 80 दिन बाद जब फली बन रही हो तब करनी चाहिए. यदि पानी सीमित हो तो केवल एक सिंचाई फूल आने के समय की जा सकती है. इस वर्ष बेमौसम बारिश के कारण किसानों को रबी फसल से बेहतर उम्मीदें हैं.
कीट नियंत्रण के उपायदीमक और अन्य कीटों के प्रकोप को रोकने के लिए अंतिम जुताई के समय क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से डालना चाहिए. इसके साथ एजोटोबैक्टर और पीएसबी कल्चर (2-3 किलोग्राम) को 50 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट में मिलाकर खेत में डालना चाहिए. इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और फसल को कीटों से सुरक्षा मिलती है.
कटाई का सही समय और सावधानियांसरसों की फसल 120 से 150 दिनों में पककर तैयार हो जाती है. जब पौधों की पत्तियां और फलियां पीली पड़ने लगें, तो तुरंत कटाई करनी चाहिए. देर होने पर फलियां फटने लगती हैं जिससे उपज में 5 से 10 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है. कटाई के दौरान यह ध्यान रखना जरूरी है कि सत्यानाशी खरपतवार के बीज या फल फसल में न मिलें, क्योंकि इससे गुणवत्ता प्रभावित होती है.



