पिपलोदी हादसे की मांओं के लिए नई उम्मीद, कलेक्टर ने फिर से जगाई किलकारियों की आस, पा सकती हैं मातृत्व सुख

जयपुर. झालावाड़ के पिपलोदी गांव की उस काली सुबह को कोई भूल नहीं पाता, जब 25 जुलाई को सरकारी अपर प्राइमरी स्कूल की छत अचानक भरभरा कर गिरी. सात मासूम बच्चे मलबे के नीचे दबकर हमेशा के लिए सो गए. सात परिवार बुझ गए, लेकिन इस हादसे के चलते दो मांओं की दुनिया ही उजड़ गई, क्योंकि उनके पास अब न बच्चे बचे, न मां बनने का रास्ता. 32 वर्षीय बिंटी बाई ने 2020 में बेटे कान्हा के जन्म के दो साल बाद नसबंदी करवा ली थी.
कान्हा और उसकी छोटी बहन दोनों उस दिन स्कूल में थे और दोनों नहीं लौटे. वहीं 36 वर्षीय राजूबाई लोधा ने छह साल पहले इकलौते बेटे के जन्म के बाद ट्यूबल लिगेशन करवाया था. उनका बेटा भी उसी मलबे में दफन हो गया. अस्पताल के विस्तर पर पर दोनों दिन-रात यही सवाल रोती रहीं कि अब हम मां कैसे बनेंगें. मनोचिकित्सकों ने इसे पीटीएसडी (Post-Traumatic Stress Disorder) का नाम दिया.
कलेक्टर ने दोनों महिलाओं के लिए की बड़ी पहल
डॉ. रेणु शर्मा ने बताया कि परिवारों के साथ हुए हादसे पीटीएसडी से कहीं ज्यादा था, क्योंकि बच्चों को खोने के बाद खालीपन आ गया था. वह इसलिए था, क्योंकि नसबंदी के बाद गर्भाशय हमेशा के लिए बंद हो चुका था. जिला कलेक्टर अजय सिंह राठौड़ ने पहली बार ऐसा फैसला लिया जो राजस्थान में पहले कभी नहीं हुआ. उन्होंने दोनों महिलाओं को तुरंत झालावाड़ के हीरा बाई कंवर महिला चिकित्सालय में भर्ती करवाया. सितंबर के आखिरी सप्ताह में राजूबाई लोधा की फैलोपियन ट्यूब रिकनालाइजेशन सर्जरी सफल रही. 29 अक्टूबर को बिंटी बाई का ऑपरेशन हुआ और दोनों अब घर लौट चुकी हैं.
नैचुरल तरीके से गर्भधारण नहीं हुआ तो IVF की ली जाएगी मदद
कलेक्टर अजय सिंह राठौड़ ने खुद दोनों के घर जाकर कहा कि तीन महीने तक प्राकृतिक रूप से कोशिश करो. अगर गर्भ नहीं ठहरा तो कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज या जयपुर के महिला चिकित्सालय में मुफ्त IVF होगा सारी फाइलें तैयार हैं और दवाइयां मुफ्त मिलेंगी. मेडिकल बोर्ड के प्रमुख डॉ. आर.के. मीणा बताते हैं है कि रिकनालाइजेशन के बाद 45-50 फीसदी महिलाएं प्राकृतिक रूप से गर्भधारण कर लेती हैं. अगर नहीं हुआ तो IVF में 60-65 फीसदी सफलता रहती है. हम हर 15 दिन में अल्ट्रासाउंड कर रहे हैं.
पिपलौदी गांव में अब भी छाया है मातम
बता दें कि पिपलोदी गांव में आज भी मातम है. मलबे की जगह नया स्कूल बन रहा है. लेकिन बिंटी बाई और राजूबाई हर सुबह मंदिर जाती हैं.बिंटी कहती हैं कि मेरा कान्हा ऊपर से देख रहा होगा. इस बार जो आएगा, उसका नाम कान्हा ही रखूंगी. वहीं राजूबाई मुस्कुराते हुए कहती हैं कि मेरा बेटा कहता था, मां एक छोटा भाई चाहिए. अब शायद उसकी बात पूरी हो जाए.वो हादसे लोगों के जेहन में सदा के लिए कैद हो गया हे. लोग उस सदमें से धीरे-धीरे उबरने की कोशिश में लगे हैं.अब सूनी हो चुकी दो आंगन फिर से किलकारियों की राह देख रहे हैं.शायद 25 जुलाई की उस काली सुबह का अंत अब एक नई सुबह से होने जा रहा है.



