सूरत से सीमांचल तक, बिहार की जीत में गुजरात का ‘साइलेंट गेम प्लान’, जिसने कर दिया चमत्कार

बिहार की सियासत की जमीन भले ही सीमांचल, कोसी और मगध में बिछी हो, लेकिन इस बार खेल कहीं दूर सूरत में भी सेट हुआ. सूरत की फैक्ट्रियों और टेक्सटाइल मार्केट में काम करने वाले लाखों बिहारी मजदूर, छोटे कारोबारी और माइग्रेंट वोटर सिर्फ रुपये ही नहीं कमा रहे थे, बल्कि चुनावी समीकरण भी बदल रहे थे. कहा जा रहा है कि जिस रणनीति ने बिहार में एक बड़ी जीत का रास्ता बनाया, उसकी असली तैयारी गुजरात में कई महीने पहले हो चुकी थी.
सूरत से बिहार का रिश्ता सिर्फ भावनाओं का नहीं, बल्कि पसीने, मेहनत और सपनों का है. गुजरात की मिलों में चलती मशीनें हों या हीरों की चमक, उनकी धड़कनों में बिहारी मजदूरों का पसीना बसा है. कपड़ा बाजार से लेकर डायमंड कटिंग तक, सूरत में आप जहां भी जाएं, कहीं न कहीं आपको कोई बिहारी मिल ही जाएगा. यही रिश्ता अब राजनीति में भी असर दिखा रहा है और इस बार असर सिर्फ रोजगार का नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन का था. इस बार बिहार का चुनाव 1,700 किलोमीटर दूर गुजरात में भी धड़क रहा था. शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सूरत में सभा कर रहे थे. भीड़ गुजरात की थी, लेकिन तालियां, नारे और आवाजों में बिहार की बोली घुली हुई थी. ये वो लोग थे जो रोजी-रोटी के लिए गुजरात आए, लेकिन दिल अब भी बिहार में धड़कता है.
मोदी ने मंच से कहा, बिहार की माताओं-बहनों और युवाओं ने आने वाले दशकों की राजनीति की नींव रख दी है. यह चुनाव जाति और संप्रदाय की राजनीति को नकारने वाला जनादेश है. इस बात पर तालियां सिर्फ इसलिए नहीं बजीं कि पीएम बोल रहे थे, बल्कि इसलिए कि सुनने वालों को लगा, ये जीत उनकी भी है. लेकिन इस चुनावी समीकरण में एक शख्स ऐसा था, जिसका नाम मंच पर कम लिया जाता है, लेकिन भूमिका इतनी गहरी है कि उसकी चर्चा किए बिना नतीजों की कहानी अधूरी है. वह हैं सीआर पाटिल.
गुजरात का मास्टर स्ट्रैटेजिस्ट जिसने बिहार में चमत्कार किया
सी.आर. पाटिल, जो नवसारी से आते हैं और गुजरात बीजेपी के सबसे मजबूत कदमों में से एक माने जाते हैं. वही पाटिल जिन्हें गुजरात में चुनाव जिताने की मशीन कहा जाता है. पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हीं की रणनीति थी, जिसने भाजपा को 182 में से 156 सीटें दिलाईं. बिहार के लिए उन्हें एक कठिन जिम्मेदारी दी गई. 78 सीटें, जिनमें कई सीमांचल की थीं. वही सीमांचल जहां जाति, धर्म, भाषा, स्थानीय समीकरण और प्रवासी पहचान सब कुछ चुनाव तय करते हैं. लेकिन पाटिल ने इसे चुनौती नहीं, अवसर माना.
गुजरात का मशहूर पेज कमेटी मॉडल पहली बार बिहार में उतारा गया. जहां हर वोटर को पन्नों में बांटकर, मैप करके, फॉलो-अप करके जोड़ा जाता है. यह मॉडल गुजरात में तो सफल था, लेकिन बिहार की राजनीति कहीं ज्यादा उथल-पुथल वाली है. फिर भी पाटिल और उनकी टीम ने दांव खेला. और सिर्फ दांव नहीं खेला, जमीन पर उतरकर खेला. 1,200 गुजरात के कार्यकर्ता पहुंचे बिहार, इनमें से कई खुद बिहारी थे करीब 1,200 कार्यकर्ता गुजरात से बिहार भेजे गए. इनमें से बड़ी संख्या ऐसी थी जो मूल रूप से बिहार की ही मिट्टी से थी, लेकिन आज भी सूरत या नवसारी में फैक्ट्री-कारखानों में काम करती है. वे बिहार लौटे, लेकिन केवल वोट डालने नहीं बल्कि बूथ मैनेजमेंट में मास्टर बनकर.
कैसे हुआ खेल
सीमांचल, पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार के गांवों में उन्होंने घर-घर जाकर डेटा अपडेट किया, सूचियां बनाईं. A-B-C-D कैटेगरी में सीटों का मूल्यांकन किया. हर पेज प्रभारी अपने मोहल्ले को पहचानता था. कौन BJP का वोटर है, कौन नाराज है, किसे मनाना है, किसे समझाना है. यह चुनाव सिर्फ पोस्टर-बैनर का नहीं था. यह एक्सेल शीट, गूगल कॉल और माइक्रो लेवल कम्युनिकेशन का चुनाव था.
चुनावी इंजीनियरिंग का नया मॉडल
सी.आर. पाटिल की पहचान गुजरात संगठन में तकनीकी दिमाग वाले नेता की है. बिहार में इसका पूरा इस्तेमाल हुआ. कॉल सेंटर बनाए गए, नाम लेकर व्हाट्सऐप वॉइस मैसेज भेजे गए, नमस्ते रमेश जी, कैसे हैं? इस बार आपका वोट बहुत महत्वपूर्ण है…एक वोटर ने कहा, ऐसा लगा जैसे पार्टी हमें व्यक्तिगत रूप से जानती है. यह सिर्फ चुनाव नहीं था, यह मनोवैज्ञानिक कनेक्ट था. कार्यकर्ता सिर्फ वोट नहीं मांग रहे थे, भावनाएं जोड़ रहे थे.
और सबसे अनोखी बात?
सी.आर. पाटिल हर मीटिंग में अपना पर्सनल मोबाइल नंबर कार्यकर्ताओं को दे देते थे. कहते – तुम्हें कोई दिक्कत हो, सीधे मुझे फोन करना. यह बात कार्यकर्ताओं के बीच कहानी बनकर फैल गई – “इतने बड़े नेता ने खुद नंबर दिया! और फिर नतीजे आए चौंकाने वाले, ऐतिहासिक… 78 सीटों की जिम्मेदारी थी. पिछली बार इनमें से NDA को केवल 31 मिली थीं. इस बार? 68 सीटें. यानी लगभग दुगनी से ज्यादा. सीमांचल में जहां BJP पहले मुश्किल से पैर जमाती थी, इस बार उसने असंभव को संभव कर दिखाया. यह नतीजा सिर्फ बिहार की जीत नहीं था, यह गुजरात की चुनावी इंजीनियरिंग का प्रमाण था. यह चुनाव बताया कि एक प्रवासी मजदूर जिसकी जेब में सूरत की फैक्ट्री का पास है, वह बिहार की राजनीति भी बदल सकता है.
सूरत और बिहार अनोखा रिश्ता
आज बिहार का एक वोटर सूरत में कपड़ा काटता है, लेकिन उसकी सोच और रणनीति बिहार के सत्ता समीकरण पर असर डालती है. गुजरात की राजनीति की प्रयोगशाला ने बिहार में परिणाम दिया, और यह बगैर शोर-शराबे के हुआ. न बड़ी रैलियाँ, न भारी भाषण. बल्कि एक नेटवर्क, एक मनोविज्ञान और एक जुड़ाव के जरिये. यह सिर्फ सीटों का खेल नहीं था. यह पहचान, प्रवास, तकनीक और भावनाओं का संगम था. यानी सूरत की फैक्ट्री से निकला वोट, सीमांचल की सरकार बनाने में काम आया.


