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Jhalkari Bai Jayanti History | रण में रानी लक्ष्मीबाई बनकर अंग्रेजों की पूरी चाल बिगाड़ दी, कहानी वीरांगना झलकारी बाई की

Last Updated:November 22, 2025, 04:45 IST

Jhalkari Bai Jayanti: झलकारी बाई 1857 की लड़ाई की वो वीरांगना थीं, जिन्होंने रानी लक्ष्मीबाई का रूप लेकर अंग्रेजों को भ्रमित किया और रानी को सुरक्षित निकलने का मौका दिया. बचपन से ही वे घुड़सवारी और हथियार चलाने में माहिर थीं. वह आगे चलकर दुर्गा दल की सेनापति बनीं और झांसी की रक्षा में अहम भूमिका निभाई.

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जनरल ह्यू भी खा गया धोखा, झलकारी बाई का वो दांव… अंग्रेजों के पसीने छुड़ा दिएजिस योद्धा ने रानी लक्ष्मीबाई बनकर अंग्रेजों को धोखा दिया, झलकारी बाई की अनकही कहानी (Photo By AI)

नई दिल्ली: 22 नवंबर का दिन भारत की उस वीरांगना को याद करने का है, जिसने रण में उतरकर अंग्रेजों की पूरी स्ट्रैटेजी उलट दी. झलकारी बाई का नाम सुनते ही झांसी की गूंज उठती है. वो सिर्फ एक सैनिक नहीं थी. वो रानी लक्ष्मीबाई की परछाई थी. जब अंग्रेजों ने झांसी को घेरा तो उन्होंने गजब किया. झलकारी बाई ने रानी का वेश बनाया और दुश्मनों को चकमा दिया. उनकी शक्ल रानी से इतनी मिलती थी कि अंग्रेज भी धोखा खा गए. इसी वजह से रानी सुरक्षित निकल पाई थी. एक दलित परिवार में जन्मी इस बेटी ने कमाल कर दिया. अंग्रेजों के जनरल ह्यू रोज के पसीने छूट गए थे. उनकी बहादुरी की मिसाल आज भी बुंदेलखंड में दी जाती है. आइए जानते हैं इस महान वीरांगना की पूरी कहानी.

साधारण परिवार में जन्म लेकर कैसे बनीं सेनापति

झलकारी बाई का जन्म 22 नवंबर 1830 को हुआ था. झांसी के पास भोजला गांव उनका घर था. वो एक साधारण कोरी परिवार से आती थी. बचपन से ही उन्हें हथियारों का शौक था. घर के काम में उनका मन कम लगता था. वो बचपन से ही काफी निडर थी. उनकी शादी पूरन कोरी से हुई. पूरन राजा गंगाधर राव की सेना में सैनिक थे. पति ने ही उन्हें तीरंदाजी सिखाई. उन्होंने कुश्ती और निशानेबाजी भी सीखी. वो कभी डरती नहीं थी. एक बार वो अपने पति के साथ महल में गई थी. वहां उन्होंने एक नौकरानी की तरह काम शुरू किया. लेकिन उनकी किस्मत में कुछ और लिखा था. रानी लक्ष्मीबाई ने उन्हें देखा. उनकी बहादुरी देख रानी दंग रह गई. उनका बात करने का तरीका बहुत तेज था. रानी ने उन्हें अपनी सेना में शामिल कर लिया. वो दुर्गा दल की महिला शाखा की सेनापति बन गई.

जब रानी की हमशक्ल बनकर अंग्रेजों को दिया चकमा

साल 1858 का समय था. अंग्रेजों ने झांसी के किले पर जोरदार हमला बोला. जनरल ह्यू रोज अपनी पूरी ताकत लगा रहा था. हालात बहुत खराब हो चुके थे. विद्रोह पूरे उत्तर भारत में फैल गया था. रानी लक्ष्मीबाई और उनके बेटे की जान खतरे में थी. तब झलकारी बाई ने एक बड़ा फैसला लिया. उनका चेहरा रानी लक्ष्मीबाई से बहुत मिलता था. कद काठी भी बिल्कुल वैसी ही थी. उन्होंने रानी के कपड़े पहन लिए. वो बिल्कुल रानी जैसी दिखने लगी. उन्होंने सेना की कमान अपने हाथ में ली. वो अंग्रेजों के सामने डटकर खड़ी हो गई. अंग्रेज कन्फ्यूज हो गए. उन्हें लगा कि वो रानी लक्ष्मीबाई से लड़ रहे हैं. अंग्रेजों ने पूरी ताकत झलकारी बाई पर लगा दी. इस बीच असली रानी सुरक्षित महल से निकल गई. यह एक ऐसा दांव था जिसने इतिहास बदल दिया.

जनरल ह्यू भी खा गया धोखा, दुर्गा दल की सेनापति झलकारी बाई ने अंग्रेजों के पसीने छुड़ा दिए थे. (Photo Generated With AI)

घायल बाघिन की तरह दुश्मनों पर टूट पड़ी वीरांगना

युद्ध बहुत भीषण चल रहा था. झलकारी बाई के पति पूरन कोरी भी वहीं लड़ रहे थे. लड़ाई के दौरान उनके पति शहीद हो गए. यह खबर सुनकर वो टूट नहीं गई. उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. वो एक घायल बाघिन की तरह लड़ी. उन्होंने कई अंग्रेजों को मार गिराया. उनकी तलवार बिजली की तरह चल रही थी. अंग्रेज उन्हें पकड़ने के लिए बेताब थे. उनकी मौत को लेकर अलग अलग बातें हैं. कुछ कहते हैं वो लड़ते हुए शहीद हुई. कुछ का मानना है उन्हें बाद में छोड़ दिया गया. वो 1890 तक जीवित रही ऐसा भी कहा जाता है. मगर सच यह है कि उन्होंने अपना फर्ज निभाया. रानी को बचाकर उन्होंने अपना मकसद पूरा कर लिया था.

बुंदेलखंड के लोग आज भी भगवान की तरह पूजते हैं

बुंदेलखंड के कण-कण में उनकी कहानी है. वहां के लोग उन्हें भगवान मानते हैं. खासकर दलित समुदाय उनकी पूजा करता है. लोकगीतों में उनकी वीरता आज भी जिंदा है. लोग बड़े चाव से उनकी कहानियां सुनाते हैं. हर साल उनकी जयंती पर मेले लगते हैं. झलकारी बाई ने साबित किया कि वीरता जाति नहीं देखती. साहस किसी का भी मोहताज नहीं होता. इतिहास ने भले ही उन्हें कम पन्ने दिए हों. मगर वो हर भारतवासी के दिल में हैं. उनकी कुर्बानी हमेशा याद रखी जाएगी. आज भी महिलाएं उनसे प्रेरणा लेती हैं. वो नारी शक्ति की एक मिसाल हैं.

Deepak Verma

दीपक वर्मा न्यूज18 हिंदी (डिजिटल) में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में काम कर रहे हैं. लखनऊ में जन्मे और पले-बढ़े दीपक की जर्नलिज्म जर्नी की शुरुआत प्रिंट मीडिया से हुई थी, लेकिन जल्द ही उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म…और पढ़ें

दीपक वर्मा न्यूज18 हिंदी (डिजिटल) में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में काम कर रहे हैं. लखनऊ में जन्मे और पले-बढ़े दीपक की जर्नलिज्म जर्नी की शुरुआत प्रिंट मीडिया से हुई थी, लेकिन जल्द ही उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म… और पढ़ें

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First Published :

November 22, 2025, 04:45 IST

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