मार्गशीर्ष माह में भूलकर भी मत खाना ये चीज! धर्म, विज्ञान और आयुर्वेद तीनों मिलकर बताते हैं चौंकाने वाली वजह

सीकर. हमारी परंपरा में हर महीने के पीछे एक विशेष ऊर्जा, आहार-विहार और मौसम से जुड़ी मान्यताएँ होती हैं. मार्गशीर्ष, जिसे अगहन भी कहा जाता है, धार्मिक दृष्टि से बेहद पवित्र महीना माना गया है. यही वह काल है जिसे शास्त्रों में तप, साधना, ब्रह्मचर्य और मन की शांति का महीना कहा गया है. इस महीने में बाजरा खरीदने और खाने की सलाह तथा जीरा से परहेज़ किया जाता है. दोनों की अपना अपना धार्मिक, वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक महत्व है.
धर्म विशेषज्ञ चंद्रप्रकाश ढांढण ने बताया कि मार्गशीर्ष मास में बाजरा खरीदने का धार्मिक कारण बताया गया है. कहा जाता है कि मार्गशीर्ष मास को भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय महीना माना गया है. गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है मैं महीनों में मार्गशीर्ष हूँ. ऐसा माना जाता है कि इस महीने में अनाज भंडारण, नई फसल की पूजा और शुभ कार्य आरंभ करना शुभ होता है. परंपरागत रूप से किसान इसी समय मोटे अनाजों का भंडारण करते हैं ताकि शीत ऋतु में पोषण की कमी न हो.
बाजरा खाने का वैज्ञानिक कारणकिसी के साथ मार्गशीर्ष महीने में बाजरा खरीदने के पीछे वैज्ञानिक कारण भी बताया जाता है. बाजरा अत्यधिक गर्मी उत्पन्न करता है, जो सर्दियों में शरीर की प्राकृतिक हीट बनाए रखने में सहायक है.इसमें फाइबर, प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, और जिंक भरपूर मात्रा में होते हैं, जो ठंड के मौसम में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए ज़रूरी हैं.यह धीरे-धीरे पचता है, जिससे लंबे समय तक ऊर्जा मिलती है.यह सर्दियों में बहुत उपयोगी है.बाजरा ऐसा अनाज है जो लंबे समय तक खराब नहीं होता, इसलिए मार्गशीर्ष में इसे खरीदकर रखना बुद्धिमानी मानी जाती हैं.
मार्गशीर्ष में जीरा खाने से परहेज़ क्योंजहां मार्गशीष महीने में बाजरा खरीदने के लिए सलाह दी जाती है वहीं जीरा जैसे मसाले को खाने से परहेज किया जाता है. इसके पीछे धार्मिक कारण बताया जाता है कि यह महीना तप, ध्यान और सात्त्विक आहार का माना गया है. शास्त्रों के अनुसार इस महीने में तीक्ष्ण, तेज और उष्ण प्रकृति वाले मसाले साधना में बाधक माने गए हैं. जो मन को भटकाते हैं और लालसा देते हैं. जिससे व्यक्ति अशांत हो जाता है.जीरा उष्ण, तीखा और पाचन अग्नि को अत्यधिक तेज करने वाला मसाला है, जिससे मन की स्थिरता प्रभावित हो सकती है.इसलिए साधकों के लिए इसे सीमित मात्रा में लेने की सलाह दी जाती है.
आयुर्वेदिक कारणमसाले को परहेज करने के लिए आयुर्वेदिक कारण भी जिम्मेदार है.आयुर्वेद के अनुसार जीरा उष्ण(गर्म) प्रकृति का होता है. ठंड के दिनों में शरीर का पाचन तंत्र प्राकृतिक रूप से संतुलित रहता है. जीरा खाने से पित्त बढ़ सकता है, जिससे शरीर में कई समस्याएँ बढ़ सकती हैं. जैसे सीने में जलन, चिड़चिड़ापन, पेट में गर्मी, मुंह के छाले, नज़दीकी मौसम में त्वचा का रूखापन आदि समस्या बढ़ जाती है. मार्गशीर्ष में आयुर्वेद सात्त्विक, संतुलित, कम मसाले वाला भोजन करने की सलाह देता है.
वही वैज्ञानिक कारण भी इसके सेवन के लिए मना करता है. क्योंकि जीरा शरीर की मेटाबॉलिक हीट बढ़ाता है. ठंड के मौसम में शरीर पहले से ही हीट संभालने में कम सक्षम होता है और ज़रूरत से ज्यादा मसाले इंफ्लेमेशन बढ़ा सकते हैं. इसके अत्यधिक सेवन से शरीर में एसिडिटी और सूजन बढ़ने की संभावना रहती है. जिन लोगों को त्वचा एलर्जी, पित्त प्रकृति, सिरदर्द, या गर्मी से संबंधित समस्या रहती है, उनके लिए मार्गशीर्ष में जीरा सीमित मात्रा में लेना ही बेहतर माना जाता है.



