लहसुन और प्याज की फसल में काली मस्सी रोग के लक्षण, रोकथाम और प्रबंधन.

नागौर. लहसुन और प्याज रसोई के साथ-साथ किसानों की आय का भी अहम आधार हैं. इन फसलों की खेती देश के लगभग हर हिस्से में की जाती है, लेकिन बदलते मौसम, बढ़ती नमी और असंतुलित खेती पद्धतियों के कारण इनमें रोगों का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है. इन्हीं रोगों में काली मस्सी एक गंभीर फफूंदजनित रोग है, जो शुरुआत में मामूली दिखाई देता है, लेकिन समय पर नियंत्रण न होने पर पूरी फसल को भारी नुकसान पहुंचा सकता है. यह रोग न केवल पौधों की वृद्धि को रोकता है, बल्कि उत्पादन और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करता है.
आज के समय में जब किसान सीमित संसाधनों में अधिक उपज की उम्मीद करता है, ऐसे रोगों की सही जानकारी और समय पर रोकथाम बेहद जरूरी हो जाती है. काली मस्सी रोग ठंडे, नम और बादलों वाले मौसम में तेजी से फैलता है, खासकर तब जब खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था नहीं होती. इसलिए इस रोग को हल्के में लेना भारी आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है. समय पर पहचान, वैज्ञानिक जानकारी और सही प्रबंधन उपाय अपनाकर किसान अपनी लहसुन और प्याज की फसल को सुरक्षित रख सकते हैं.
काली मस्सी रोग के प्रमुख लक्षणकिसान रामपाल ने बताया कि काली मस्सी रोग की पहचान करना आसान है. इस रोग में सबसे पहले पत्तियों पर हल्के पीले या हरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. पत्तियों की निचली सतह पर धूसर या काले रंग की फफूंद की परत जम जाती है. धीरे-धीरे पत्तियां मुरझाने लगती हैं, मुड़ जाती हैं और बाद में सूख जाती हैं. पौधों की बढ़वार रुक जाती है और गांठ यानी बल्ब का आकार छोटा रह जाता है, जिससे उत्पादन में सीधी गिरावट आती है.
उन्होंने बताया कि इस रोग के फैलने के प्रमुख कारणों में खेत में अधिक नमी और कम तापमान, जल निकास की कमी, बहुत घनी बुवाई, संक्रमित बीज या पौधों का उपयोग और लगातार एक ही खेत में प्याज या लहसुन की खेती करना शामिल है.
रोकथाम और प्रबंधन के उपायएग्रीकल्चर एक्सपर्ट बजरंग चौधरी ने बताया कि काली मस्सी रोग की रोकथाम के लिए सबसे पहले खेत में उचित जल निकास की व्यवस्था करना जरूरी है. पौधों के बीच उचित दूरी रखें ताकि हवा का संचार बना रहे और नमी अधिक समय तक न ठहरे. रोगग्रस्त पत्तियों और पौधों को तुरंत निकालकर नष्ट करें, ताकि रोग अन्य स्वस्थ पौधों में न फैले. इसके साथ ही फसल चक्र अपनाएं और एक ही खेत में बार-बार प्याज या लहसुन की खेती न करें.
गोबर की खाद का करें प्रयोगउन्होंने बताया कि जैविक और प्राकृतिक उपाय भी इस रोग के नियंत्रण में प्रभावी हैं. नीम आधारित जैव-कीटनाशकों का छिड़काव किया जा सकता है. ट्राइकोडर्मा जैसे लाभकारी सूक्ष्मजीवों का उपयोग मिट्टी उपचार में करें. गोबर की सड़ी खाद का प्रयोग करने से मिट्टी की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है.
इस तरीके से करें छिड़कावजब रोग का प्रकोप अधिक हो जाए, तब कार्बेन्डाजिम 12 प्रतिशत और मैन्कोजेब 63 प्रतिशत डब्ल्यूपी की अनुशंसित मात्रा को पानी में घोलकर छिड़काव करें. यह छिड़काव 7 से 10 दिन के अंतराल पर दोहराएं. ध्यान रखें कि दवा का छिड़काव सुबह या शाम के समय ही करें, ताकि दवा का प्रभाव बेहतर रहे और फसल सुरक्षित रहे.



