Charbhuja Nath Temple: 5500 साल पुराने मंदिर में आज भी है परंपरा, सोने की पालकी में नगर भ्रमण पर निकलते हैं चारभुजा नाथ

Last Updated:September 22, 2026, 22:47 IST
Charbhuja Nath Temple: राजसमंद के गढ़बोर स्थित प्रसिद्ध चारभुजा नाथ मंदिर में जलझूलनी एकादशी पर भगवान की भव्य शाही सवारी निकाली जाती है. सोने की पालकी, हाथी-घोड़े, पारंपरिक लाल पाग और प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों के साथ ठाकुरजी नगर भ्रमण करते हुए दूधतलाई पहुंचते हैं. करीब 2 किलोमीटर के मार्ग पर श्रद्धालु गुलाल उड़ाकर इस अनोखी परंपरा का हिस्सा बनते हैं.
उदयपुर. राजसमंद के गढ़बोर स्थित मेवाड़ के प्रसिद्ध चारभुजा नाथ मंदिर में जलझूलनी एकादशी पर हर साल एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसमें भगवान के साथ मेवाड़ की पुरानी धार्मिक और राजसी परंपराओं की झलक भी देखने को मिलती है. इस दिन ठाकुरजी मंदिर से बाहर निकलकर नगर भ्रमण करते हैं और विशेष शोभायात्रा के जरिए दूधतलाई तक पहुंचते हैं. करीब 5500 साल पुराने बताए जाने वाले इस मंदिर में होने वाला यह आयोजन श्रद्धालुओं के लिए खास आस्था का अवसर माना जाता है.
जलझूलनी एकादशी पर सबसे खास बात भगवान चारभुजा नाथ की पालकी होती है. इस दिन ठाकुरजी को सोने की पालकी में विराजमान किया जाता है. इसके बाद शाही लवाजमे के साथ पालकी मंदिर से रवाना होती है. शोभायात्रा में हाथी और घोड़े भी शामिल होते हैं. पुजारी परिवार के सदस्य पारंपरिक लाल पाग पहनकर ठाकुरजी के साथ चलते हैं.
हर साल निभाई जाती है ये परंपरा
इस परंपरा में मंदिर के पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र भी विशेष भूमिका निभाते हैं. शोभायात्रा के मौके पर सोने-चांदी के गदा, भाले, तलवार, बंदूक सहित अन्य अस्त्र-शस्त्र बाहर निकाले जाते है. इन्हें भगवान की शक्ति और वैभव का प्रतीक माना जाता है. पुजारी परिवार इन अस्त्र-शस्त्र की पूजा और देखरेख की जिम्मेदारी संभालता है. भगवान की पालकी के साथ इनका शामिल होना इस शोभायात्रा को बाकी धार्मिक आयोजनों से अलग बनाता है. ठाकुरजी की पालकी जब नगर भ्रमण पर निकलती है तो एक और खास परंपरा निभाई जाती है. श्रद्धालु रास्तेभर गुलाल उड़ाते हैं, करीब दो किलोमीटर लंबे शोभायात्रा मार्ग पर जब गुलाल उड़ता है तो पूरा रास्ता गुलाबी रंग में रंगा नजर आता है. भगवान के जयकारों के बीच भक्त इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं.
नगर भ्रमण के बाद ठाकुरजी दूधतलाई पहुंचते हैं. यहां पहले दूधतलाई की परिक्रमा की जाती है और फिर भगवान को स्नान कराया जाता है. इसी वजह से इसे जलझूलनी एकादशी की परंपरा से जोड़ा जाता है. चारभुजा नाथ मंदिर की जलझूलनी एकादशी की यह परंपरा सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं है. इसमें भगवान की सोने की पालकी, पुजारी परिवार की पारंपरिक वेशभूषा, हाथी-घोड़े, प्राचीन अस्त्र-शस्त्र और गुलाल की परंपरा एक साथ दिखाई देती है. यही वजह है कि हर साल इस दिन चारभुजा नाथ धाम में मेवाड़ की पुरानी आस्था और परंपरा का अनोखा स्वरूप देखने को मिलता है.
About the Authorमोनाली पाल
नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
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Udaipur,Rajasthan
First Published :
September 22, 2026, 22:47 IST



