Saraneshwar Mahadev Temple: सिरोही का ये मेला खिलजी पर जीत का प्रतीक, एक दिन के लिए खुलते हैं राजमहल के द्वार

Last Updated:September 22, 2026, 23:01 IST
Saraneshwar Mahadev Temple: सिरोही का प्रसिद्ध सारणेश्वर महादेव मेला देवझूलनी एकादशी से शुरू होता है. करीब 700 साल पुरानी यह परंपरा खिलजी की सेना पर सिरोही की ऐतिहासिक जीत से जुड़ी है. इस मौके पर राजमहल से ठाकुरजी की शाही रेवाड़ी निकलती है और देवासी समाज एक दिन के लिए मंदिर की परंपरा निभाता है.
सिरोही. जिले के आराध्यदेव सारणेश्वर महादेव मंदिर का ऐतिहासिक मेला देवझूलनी एकादशी को शुरू होता है. ये दो दिवसीय मेला खिलजी की सेना के खिलाफ सिरोही रियासत और देवासी समाज के संघर्ष और विजय का प्रतीक माना जाता है. देवझूलनी एकादशी को सिरोही के राजमहल से ठाकुरजी की विशाल रेवाड़ी राजसी ठाठबांट के साथ निकाली जाती है. सिरोही राजपरिवार के देववत सिंह ने बताया कि सारणेश्वर मेले की शुरुआत वर्ष 1298 से मानी जाती है. विक्रम संवत 1355 में भाद्रपद माह की ग्यारस पर, उस समय के सिरोही रियासत के शासक महाराव विजयराज देवड़ा ने खिलजी की सेना के द्वारा गुजरात के सिद्धपुर में रुद्रमाल को लूटकर वहां से ले जाया जा रहा शिवलिंग खिलजी की सेना से वापस लाने के लिए सिरोही की सेना के साथ हमला करने का फैसला किया. जिसमें सिरोही में सिरनवा पहाड़ियों की तलहटी में हुए भीषण युद्ध में सिरोही की सेना ने देवासी समाज के सहयोग से खिलजी की सेना को हराकर भागने पर मजबूर कर दिया था. इस युद्ध में देवासी समाज ने महाराव विजयराज देवड़ा का साथ दिया था, जिसके बाद एक दिन के लिए मंदिर देवासी समाज को सौंपने की परम्परा शुरू हुई जो आज भी कायम है.
विजय का प्रतीक और ये खास परंपराइस परंपरा के अनुसार खिलजी के साथ हुए युद्ध में मिली विजय के सम्मान में महाराव विजयराज देवड़ा ने देवासी समाज को देवझूलनी एकादशी को सारणेश्वर मेले के आयोजन का अधिकार दिया था. तभी से यह परंपरा आज भी चली आ रही है. इस कारण देवझूलनी एकादशी का यह मेला देवासी समाज के लिए साहस का प्रतीक माना जाता हैं.
देवझूलनी एकादशी पर शाही पालकीदेवझूलनी एकादशी पर चली आ रही ये परंपरा निभाई गई. राजमहल स्थित पद्मनाभ मंदिर से शाही अंदाज में राजसी ठाठ-बाठ के साथ ठाकुरजी की पालकी के साथ रेवाड़ी निकाली गई. 1425 में सिरोही राज्य की स्थापना के समय सिरोही के राजमहल के पास पद्मनाभ मंदिर बनाया गया था. तब से मंदिर से पहली पालकी रवाना होती है, धीरे-धीरे शहर के मुख्य मार्गों से निकलने पर स्थानीय पालकियां भी जुड़ने लगती है. इस यात्रा में घोड़ों पर सवार घुड़सवार और पैदल सैनिक भी इसे खास बनाते हैं. रेवाड़ी शहर के मुख्य मार्गों से होते हुए शहर के छोटे तालाब पहुंचकर संपन्न होती है.
यहां ठाकुरजी को स्नान करवाकर यात्रा का समापन होता है. इसके बाद ही सारणेश्वर में मेले का आयोजन शुरू होता है. अगले दिन तक यहां भारी संख्या में देवासी समाज के लोग जुटते हैं. सिरोही जिले के अलावा राजस्थान और गुजरात से भी काफी देवासी समाज के लोग पहुंचते हैं और अपने पूर्वजों को याद करते हैं. सारणेश्वर महादेव ना सिर्फ सिरोही बल्कि आसपास के जिले जालौर और पाली के भी आराध्य देव माने जाते है. सिरोही राजपरिवार के कुलदेवता होने के साथ ही दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान के लोगों में भगवान सारणेश्वर महादेव में गहरी आस्था है. देवझूलनी एकादशी पर कई जिलों से भक्त यहां महादेव के दर्शन करने आते हैं.
About the Authorमोनाली पाल
नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…
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Sirohi,Rajasthan
First Published :
September 22, 2026, 23:01 IST



