नागौर के इस गांव में करते हैं महिला की पूजा, 300 साल पुरानी खेजड़ी बनी आस्था का केंद्र, आजादी के बाद से नहीं खुला शराब का ठेका

Last Updated:September 26, 2026, 07:12 IST
Nagaur Manjhwas Village Unique Traditions: राजस्थान के नागौर जिले का मांझवास गांव अपनी अनूठी आस्था और नशामुक्ति के लिए प्रसिद्ध है. यहां किसी देवी-देवता की नहीं, बल्कि फूलां बाई नामक महिला की लोकदेवता के रूप में पूजा होती है. गांव में 300 साल पुरानी खेजड़ी का पेड़ श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है. इस गांव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि आजादी के बाद से यहां आज तक शराब का कोई ठेका नहीं खुला. गांव वाले हर साल पर्यावरण संरक्षण और नशामुक्ति का संकल्प लेते हैं. मंदिर का 91 फीट ऊंचा गुम्बद और इसका अद्भुत स्थापत्य भी लोगों को आकर्षित करता है.
राजस्थान के नागौर जिले में मांझवास गांव की आस्था और सामाजिक परंपरा की कहानी बेहद खास है. यहां मंदिर में किसी देवी-देवता की नहीं, बल्कि करीब 300 साल पुरानी खेजड़ी के नीचे पूजी जाने वाली फूलां बाई की श्रद्धा से पूजा की जाती है. ग्रामीण उन्हें लोकदेवता के रूप में मानते हैं और उनके प्रति गहरी आस्था रखते हैं. गांव की एक और खास पहचान नशे से दूरी को लेकर बनी सामाजिक परंपरा है. ग्रामीणों के अनुसार, आजादी के बाद से मांझवास और आसपास के कुछ गांवों में शराब का ठेका तक नहीं खुला है.
मांझवास का फूलां बाई मंदिर अपनी धार्मिक आस्था के साथ अनोखी स्थापत्य कला के लिए भी आकर्षण का केंद्र है. मंदिर का मुख्य गुम्बद जमीन से करीब 91 फीट ऊंचा बताया जाता है. इसके चारों ओर बने झरोखों में अलग-अलग देवी-देवताओं की संगमरमर की 56 मूर्तियां स्थापित हैं, जबकि इन मूर्तियों के ऊपर 56 छोटे गुम्बद बनाए गए हैं. मंदिर में श्रद्धालुओं के प्रवेश और बाहर निकलने के लिए पांच अलग-अलग रास्ते हैं. यही वजह है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर की आस्था के साथ इसकी अनोखी बनावट भी कौतूहल का विषय बनी रहती है.
फूलां बाई की कहानी से जुड़ी सबसे प्रमुख निशानी गांव में मौजूद करीब 300 साल पुरानी खेजड़ी है. ग्रामीणों के अनुसार, इसी खेजड़ी के नीचे फूलां बाई गोबर के उपले बनाया करती थीं. समय बीतने के साथ यहां एक चबूतरे का निर्माण किया गया और आज भी श्रद्धालु इस स्थान पर आकर फेरी लगाते हैं. खेजड़ी के पास फूलां बाई के लिए एक अलग स्थान भी बनाया गया है. मंदिर की भव्यता के बीच यह प्राचीन पेड़ आज भी फूलां बाई से जुड़ी पुरानी यादों और ग्रामीणों की आस्था का प्रतीक बना हुआ है.
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ग्रामीणों के अनुसार, फूलां बाई ब्रह्मचारिणी थीं और भगवान राम की भक्ति में लीन रहती थीं. वह सितार बजाकर भजन गाया करती थीं. उनकी भक्ति से जुड़ी निशानी के तौर पर उनका सितार आज भी सुरक्षित रखा गया है. मंदिर परिसर में फूलां बाई के साथ उनके भाई का स्थान भी बनाया गया है. ग्रामीणों के मुताबिक, फूलां बाई को अपने परिवार का हिस्सा मानने की परंपरा आज भी कायम है. उनकी स्मृतियों से जुड़े स्थानों पर श्रद्धालु पहुंचते हैं और आस्था के साथ उनके जीवन और भक्ति को भी याद करते हैं.
ग्रामीणों के मुताबिक, गांव का नाम मांझू जाति के नाम से जुड़ा हुआ है. गांव में करीब 300 परिवार रहते हैं और मांझू समाज के लोग फूलां बाई को अपने परिवार की सदस्य के साथ लोकदेवता के रूप में पूजते हैं. फूलां बाई की बरसी पर हर साल गांव में धर्म सम्मेलन का आयोजन किया जाता है, जिसमें आसपास के गांवों के अलावा दूसरे राज्यों में रहने वाले मांझू समाज के लोग भी शामिल होते हैं. इस दौरान धार्मिक कार्यक्रमों के साथ पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीवों की सुरक्षा और नशे से दूर रहने का संकल्प भी लिया जाता है.
मांझवास में आयोजित होने वाला धर्म सम्मेलन धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण और नशामुक्ति के संदेश से भी जुड़ा है. ग्रामीणों के अनुसार, इस सम्मेलन की शुरुआत पद्मश्री हिम्मताराम भांभू ने की थी और इसके बाद हर साल आयोजन की परंपरा जारी है. झाड़ीसरा, कंवलीसर, झटेरा, जांजोलाई और जीवण बेरा समेत आसपास के गांवों में भी नशे से दूर रहने को लेकर जागरूकता की बात कही जाती है. ग्रामीणों का दावा है कि मांझवास में आज तक शराब का ठेका नहीं खुला है और गांव के लोग नशे से दूर रहने को लेकर सामाजिक रूप से जागरूक हैं.
फूलां बाई मंदिर समिति के अध्यक्ष कैलाश गोदारा के अनुसार, मंदिर परिसर में कोई व्यक्ति नशा करते या सिगरेट पीते हुए नजर नहीं आता. गांव में नशे से दूर रहने को लेकर लोगों के बीच जागरूकता है और शराब का ठेका नहीं खुलने देने की परंपरा भी लंबे समय से कायम है. यही वजह है कि मांझवास की पहचान केवल धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि लोकआस्था, पर्यावरण संरक्षण और नशामुक्ति के सामाजिक संदेश से जुड़े गांव के तौर पर भी बनी हुई है.
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September 26, 2026, 07:12 IST



