उदयपुर के 2 करोड़ के घूस केस की क्या है कहानी? जिसमें पकड़ा गया SOG ASP मुकेश सोनी, पढ़िए इनसाइड स्टोरी

उदयपुर. राजस्थान पुलिस की स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप यानी एसओजी के एडिशनल एसपी मुकेश सोनी की गिरफ्तारी ने अब सिर्फ उदयपुर के 272 प्लॉट घोटाले तक सीमित सवाल नहीं छोड़े हैं. एंटी करप्शन ब्यूरो यानी एसीबी ने उन्हें दो करोड़ रुपए की कथित रिश्वत मांगने के मामले में गिरफ्तार किया है. आरोप है कि उदयपुर के 272 प्लॉट प्रकरण में एफआईआर और जब्त सामान से जुड़े काम के बदले यह रकम मांगी गई थी. इस मामले में दलाल सज्जन सिंह भी गिरफ्तार है. कोर्ट ने दोनों को 30 सितंबर तक पुलिस रिमांड पर भेजा है.
लेकिन इस कार्रवाई के बाद मुकेश सोनी का करीब चार साल पुराना एक ड्रग्स प्रकरण भी फिर से चर्चा में आ गया है. उस मामले में करोड़ों की ड्रग्स बरामदगी, मुख्य आरोपी पर धाराओं में बदलाव, जांच की दिशा और कथित तौर पर सबूतों में तकनीकी खामियां छोड़ने जैसे सवाल पहले ही उठ चुके थे. अब एसीबी की ताजा कार्रवाई ने उन पुरानी फाइलों को भी फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है.
दो करोड़ की मांग से शुरू हुई नई जांच
एसीबी के अनुसार, उदयपुर के 272 प्लॉट घोटाले में कार्रवाई के बदले दो करोड़ रुपए की रिश्वत मांगने का आरोप सामने आया. मामले में दलाल सज्जन सिंह से पूछताछ के बाद मुकेश सोनी की भूमिका जांच के दायरे में आई और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. आमने-सामने की पूछताछ में सज्जन सिंह ने कथित तौर पर बताया कि वह एएसपी के इशारे पर परिवादियों से संपर्क में रहता था. गिरफ्तारी के बाद एसीबी ने दोनों आरोपियों के मोबाइल फोन एफएसएल जांच के लिए भेजे हैं. इसका मतलब यह है कि जांच एजेंसी अब सिर्फ बयानों पर निर्भर नहीं रहना चाहती, बल्कि कथित लेनदेन और संपर्क के डिजिटल सबूत भी खंगाल रही है. एसीबी ने उदयपुर स्थित एसओजी कार्यालय की तलाशी भी ली. तलाशी का एक अहम मकसद यह पता लगाना था कि मुकेश सोनी के पास किन-किन मामलों की जांच थी और उनके पास मौजूद फाइलों में क्या-क्या हुआ. जांच में एक अन्य व्यक्ति का नाम भी सामने आने की बात कही गई है. कुछ और लोगों की भूमिका भी एसीबी की रडार पर बताई जा रही है.
चार साल पुरानी ड्रग्स फाइल फिर क्यों खुली?
मुकेश सोनी के खिलाफ मौजूदा रिश्वत मामले के बीच 2021-22 का वह ड्रग्स केस फिर सामने आया, जिसमें जयपुर और अजमेर में करीब 11 करोड़ रुपए की ड्रग्स बरामदगी हुई थी. उस समय मुकेश सोनी अजमेर में सीओ पद पर तैनात थे. एसओजी ने पुलिस विभाग को 64 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें ड्रग्स तस्करों से कथित सांठगांठ के आरोपों का उल्लेख था. सवाल यह है कि जब इतनी गंभीर रिपोर्ट सामने थी, तब उसके बाद क्या कार्रवाई हुई और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच किस स्तर पर हुई? इसी दौरान मुकेश सोनी को एसओजी अजमेर और बाद में उदयपुर में एएसपी की जिम्मेदारी दी गई और कई महत्वपूर्ण मामलों की जांच उनके पास रही. यही बात अब जांच के इस नए दौर में अहम हो गई है कि पहले की गंभीर शिकायतों और मौजूदा रिश्वत मामले के बीच क्या कोई प्रशासनिक पैटर्न दिखाई देता है.
मुख्य आरोपी को राहत, दूसरे आरोपियों पर कड़ी धाराएं लगाने का आरोप
पुराने ड्रग्स केस को लेकर एक और गंभीर सवाल मुख्य आरोपी श्यामसुंदर मूंडड़ा की जांच से जुड़ा है. आरोप है कि उसे फरार होने का मौका दिया गया और उसकी जगह एक चौकीदार तथा चायवाले को गिरफ्तार कर लिया गया. यह भी आरोप है कि बरामदगी के 24 घंटे बाद तक रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई. इसके बाद एफआईआर में मुख्य आरोपी मूंडड़ा के खिलाफ एनडीपीएस की गंभीर धारा 8-22 के बजाय अपेक्षाकृत हल्की धारा 8-29 लगा दी गई. दूसरी ओर, उसके सहयोगियों मोमिन शाह, कालूराम जाट और शेख साजिद पर गंभीर धाराएं लगाई गईं. इस पूरे प्रकरण ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या जांच में आरोपी की भूमिका के मुताबिक धाराएं लगाई गईं या किसी को राहत पहुंचाने की कोशिश हुई.
जब्ती की कार्रवाई से जुड़े दस्तावेजों में ड्रग्स इंस्पेक्टर रविन्द्र को 24 मई और 1 जून को घटनास्थल पर मौजूद बताया गया. बाद में दस्तावेजों से यह सामने आने का दावा किया गया कि उन तारीखों पर वह विभागीय निरीक्षण के लिए दूसरी जगह थे. यानी एक ही अधिकारी को अलग-अलग स्थानों पर मौजूद दिखाने की विसंगति सामने आई. जांच एजेंसियों के लिए यह सिर्फ दस्तावेजी गलती है या जानबूझकर छोड़ी गई तकनीकी खामी, यह बड़ा सवाल बना रहा.
हाईकोर्ट पहुंचा मामला तो उठे पुलिस की भूमिका पर सवाल
पुराने ड्रग्स मामले में मामला राजस्थान हाईकोर्ट पहुंचा तो तत्कालीन घटनाक्रम की जांच भी हुई. हाईकोर्ट के आदेश के बाद एसओजी अजमेर की तत्कालीन एएसपी दिव्या मित्तल ने प्रकरण की जांच की थी. उनकी रिपोर्ट में कथित तौर पर यह सामने आया कि श्यामसुंदर मूंडड़ा के खिलाफ गंभीर धारा हटाई गई और उसके कब्जे से नशीली दवा बरामद न होने का आधार बताया गया. मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस फरजंद अली ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे और अधिकारियों की भूमिका की जांच के निर्देश दिए थे. कोर्ट ने डीजीपी को व्यक्तिगत निगरानी में जांच कराने और पुलिस अधिकारियों की संभावित संलिप्तता पर रिपोर्ट पेश करने को कहा था. यानी जिस केस में अदालत ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए, उसी से जुड़े अधिकारी का नाम अब एक नए भ्रष्टाचार मामले में सामने आया है. हालांकि दोनों मामलों के बीच सीधा आपराधिक संबंध साबित करना अभी जांच का विषय है, लेकिन पुरानी फाइल का दोबारा चर्चा में आना अपने आप में महत्वपूर्ण है.
अब ACB के सामने सबसे बड़े सवाल क्या हैं?
मौजूदा जांच में सबसे अहम कड़ियां मोबाइल फोन, कॉल रिकॉर्ड, कथित पैसों की मांग, दलाल की भूमिका और एसओजी कार्यालय से मिले दस्तावेज हो सकते हैं. इसके साथ यह भी देखा जाएगा कि मुकेश सोनी के पास किन मामलों की जांच रही, उनमें किस तरह के आदेश हुए और किस स्तर पर निर्णय लिए गए. यही वजह है कि यह मामला सिर्फ दो करोड़ रुपए की कथित रिश्वत तक सीमित नहीं रह गया है. एक तरफ 272 प्लॉट प्रकरण में एसीबी की कार्रवाई है, दूसरी तरफ पुराने ड्रग्स केस की जांच प्रक्रिया पर पहले उठे सवाल हैं. अब दोनों फाइलें एक साथ चर्चा में हैं.
एसीबी की मौजूदा जांच और एफएलएल रिपोर्ट यह तय करने में अहम होंगी कि आरोपों के पीछे कितना ठोस डिजिटल और दस्तावेजी आधार है. फिलहाल मुकेश सोनी और दलाल सज्जन सिंह रिमांड पर हैं. जांच आगे बढ़ने के साथ यह साफ होना बाकी है कि 272 प्लॉट प्रकरण में कथित रिश्वत मांगने की पूरी कड़ी कहां तक जाती है और क्या पुराने मामलों की जांच में उठे सवालों का कोई नया सिरा भी सामने आता है.



