85 साल की उम्र, हाथों में गजब की फुर्ती, महज 40 सेकंड में जोधपुरी साफा बांध देते हैं बिन्जाराम गौड़

Last Updated:October 05, 2026, 12:21 IST
Jodhpur Binjaram Gaud Unique Safa Tying Art: राजस्थान में साफा सिर्फ सिर पर बांधा जाने वाला कपड़ा नहीं, बल्कि आन-बान, सम्मान और सामाजिक पहचान से जुड़ी सदियों पुरानी परंपरा है. बदलते दौर में साफा बांधने का हुनर धीरे-धीरे कम होता जा रहा है, लेकिन जोधपुर में 85 वर्ष से अधिक उम्र के बिन्जाराम गौड़ आज भी इस कला को जिंदा रखे हुए हैं. मूल रूप से बाड़मेर के रहने वाले बिन्जाराम पिछले कई वर्षों से जोधपुर में रह रहे हैं. उम्र के इस पड़ाव पर भी उनके हाथों की फुर्ती ऐसी है कि वे महज 40 सेकंड में राजस्थानी अंदाज का साफा बांधकर तैयार कर देते हैं. शादी-ब्याह, धार्मिक आयोजन और खास मौकों पर साफा पहनाने की परंपरा आज भी मारवाड़ में देखने को मिलती है. बिन्जाराम का हुनर सिर्फ उनकी व्यक्तिगत पहचान नहीं, बल्कि राजस्थान की उस सांस्कृतिक विरासत की झलक है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है.
जोधपुर. राजस्थान की पहचान में साफा सिर्फ सिर पर बांधा जाने वाला कपड़ा नहीं, बल्कि आन-बान और सम्मान की परंपरा रहा है. बदलते दौर में भले ही साफा बांधने की यह कला अब कम नजर आती हो, लेकिन जोधपुर में 85 वर्ष से अधिक उम्र के बिन्जाराम गौड़ आज भी इस पारंपरिक हुनर को पूरी शिद्दत से जिंदा रखे हुए हैं. मूल रूप से बाड़मेर निवासी बिन्जाराम गौड़ पिछले कई वर्षों से जोधपुर में रह रहे हैं और उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका हाथ साफा बांधने में इतना माहिर है कि महज 40 सेकंड में साफा बांधकर तैयार कर देते हैं. कभी राजस्थान के बुजुर्गों की पहचान रहा साफा आज उनके हुनर में बीते दौर की उस परंपरा की झलक दिखाता है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी अपने आप में एक विरासत को बचाए रखने जैसा है.
राजस्थान में साफा पहनने की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है. खासतौर पर मारवाड़ में साफा केवल पहनावा नहीं, बल्कि व्यक्ति के सम्मान, स्वाभिमान और सामाजिक पहचान से जुड़ा रहा है. किसी बड़े आयोजन, शादी-ब्याह, धार्मिक कार्यक्रम या खास मेहमान के स्वागत के दौरान साफा पहनाने की परंपरा आज भी देखने को मिलती है. जोधपुर का साफा अपनी खास बांधने की शैली और रंगों के कारण अलग पहचान रखता है. हालांकि आधुनिक दौर में पगड़ी और साफा बांधने की कला जानने वाले लोगों की संख्या लगातार कम होती जा रही है. ऐसे में बिन्जाराम गौड़ जैसे बुजुर्ग इस परंपरा को अपने हुनर के जरिए आज भी जीवित रखे हुए हैं.
बिन्जाराम के हाथों की फुर्ती देख लोग रह जाते हैं हैरान
उम्र भले ही 85 वर्ष से अधिक हो चुकी हो, लेकिन बिन्जाराम गौड़ के हाथों की फुर्ती आज भी देखते ही बनती है. साफे के कपड़े को हाथ में लेते ही वे उसकी तह और लंबाई को समझ लेते हैं और देखते ही देखते सिर पर राजस्थानी अंदाज का साफा तैयार कर देते हैं. खास बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में उन्हें करीब 40 सेकंड का ही समय लगता है. साफा बांधते समय उनके हाथों की गति और कपड़े को सही तरीके से मोड़ने का अंदाज बताता है कि यह हुनर उन्होंने वर्षों की मेहनत और अभ्यास से हासिल किया है. उनके लिए यह महज एक कला नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी परंपरा है.
85 वर्ष की उम्र में भी महज 40 सेकंड में जोधपुरी साफा बांध देते हैं
बिन्जाराम गौड़ मूल रूप से बाड़मेर के रहने वाले हैं, लेकिन पिछले कई वर्षों से जोधपुर में रह रहे हैं. मारवाड़ की इसी मिट्टी में उन्होंने अपनी कला को लगातार संजोकर रखा है. आज जब नई पीढ़ी पारंपरिक पहनावे से ज्यादा आधुनिक फैशन की ओर बढ़ रही है, तब साफा बांधने जैसी लोक परंपराएं धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है. ऐसे सय में बिन्जाराम गौड़ का हुनर सिर्फ उनकी व्यक्तिगत पहचान नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत की एक झलक भी है. 85 वर्ष की उम्र में भी जब वे महज 40 सेकंड में जोधपुरी साफा बांध देते हैं, तो यह साफा उनके सिर पर ही नहीं, बल्कि बदलते दौर के बीच राजस्थान की पुरानी परंपरा को भी सम्मान के साथ थामे नजर आता है.About the Authorदीप रंजन सिंह Content Producer
दीपरंजन सिंह लगभग एक दशक से पत्रकारिता के फिल्ड से जुड़े हुए हैं. वह अभी न्यूज18 हिंदी के राजस्थान डिजिटल डेस्क से जुड़े हैं, जहां वे बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले लगभग एक दशक से सक्रिय पत…
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Jodhpur,Rajasthan
First Published :
October 05, 2026, 12:21 IST



