Rajasthan

अनाथ और असहाय बच्चों का सहारा बना बनी ठनी बायोसा माता धाम, दिन में तीन बार लगता है माता रानी को भोग

पाली. मां’ शब्द अपने आप में ही ममता और सुरक्षा की सबसे बड़ी मूरत है. लेकिन जब बात जगज्जननी की आए, तो भक्तों के सारे दुख-दर्द पल भर में छूमंतर हो जाते हैं. राजस्थान के पाली जिले में स्थित ‘बनी ठनी बायोसा माता जी धाम’ एक ऐसा ही आस्था का केंद्र है, जहां दुखी, असहाय और अनाथ बच्चों को मां का साक्षात स्नेह और सहारा मिलता है. पाली की पावन धरा पर बसा यह धाम अपनी अनोखी मान्यताओं और चमत्कारों के लिए पूरे मारवाड़ क्षेत्र में जाना जाता है. मंदिर की सबसे बड़ी अलौकिक खासियत यह है कि यहां विराजित बायोसा माता दिन में तीन बार (सुबह, दोपहर और संध्या) भोग स्वीकार करती हैं. मान्यता है कि जब-जब भक्त सच्ची श्रद्धा के साथ मां को भोग अर्पण करते हैं, तो मां अपनी कृपा से भक्तों का कल्याण करती हैं.

बायोसा माता को विशेष रूप से अनाथ, असहाय और दुखी बच्चों की रक्षक माना जाता है. जो बच्चे दुनिया की ठोकरें खाते हैं या किसी शारीरिक-मानसिक कष्ट से जूझ रहे होते हैं, उनके परिजन या वे स्वयं जब बायोसा माता के चरणों में शीश नवाते हैं, तो मां उन्हें अपना वात्सल्य रूपी आंचल प्रदान करती हैं. चाहे संतान की कामना हो या जीवन के संकटों से मुक्ति, पाली के इस बनी ठनी बायोसा माता धाम पर आने वाला कोई भी श्रद्धालु खाली हाथ वापस नहीं लौटता.

श्रद्धालुआों की गहरी आस्था का केन्द्रपाली जिले में स्थित श्री बनी ठनी बायोसा माता जी धाम स्थानीय श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है. धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं से जुड़े इस धाम की कई ऐसी खासियतें हैं, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती हैं. मंदिर की प्रमुख धार्मिक गतिविधियों में माता जी का त्रिकाल भोग (तीन समय का भोग) शामिल है. शास्त्रोक्त विधि-विधान के अनुसार, प्रतिदिन प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल में माता रानी को विशिष्ट भोग अर्पित किया जाता है.

पाली जिले से कनेक्शन और इतिहासराजस्थान के मारवाड़ अंचल, विशेषकर पाली जिले में लोक देवियों और सती-माता (बायोसा) की पूजा की प्राचीन परंपरा रही है. ‘बायोसा’ शब्द मारवाड़ में कुंवारी कन्या/देवी स्वरूप के आदरसूचक नाम के रूप में प्रयुक्त होता है. पाली के ‘बनी ठनी बायोसा माता’ धाम का इतिहास local मारवाड़ी संस्कृति और बायोसा की असीम अनुकंपा से जुड़ा हुआ है. ‘बनी ठनी’ स्वरूप मां के भव्य, अलौकिक और दुल्हन और राजसाही श्रृंगार के कारण पड़ा है. सदियों से पाली और आसपास के ग्रामीण इलाकों के लोग बायोसा माता को अपनी कुलदेवी या रक्षक देवी के रूप में पूजते आ रहे हैं.

क्या है इस मंदिर की मान्यता आप भी जानेदिन में तीन बार भोग की परंपरा: मंदिर में प्रातःकालीन मंगला आरती, दोपहर का राजभोग और संध्या आरती के समय विशेष भोग लगाया जाता है. मान्यता है कि माता रानी स्वयं सूक्ष्म रूप में आकर इस भोग को स्वीकार करती हैं.

दुखी व अनाथ बच्चों की रक्षक देवी: लोक आस्था है कि जिन बच्चों के सिर से मां-बाप का साया उठ जाता है या जो बच्चे अनाथ होते हैं, बायोसा माता उनकी संरक्षक बनती हैं. बच्चों के कष्टों का निवारण करना इस धाम की सबसे बड़ी महिमा मानी जाती है.

विशेष श्रृंगार (बनी ठनी स्वरूप): माता जी की प्रतिमा का रोजाना राजस्थानी पारंपरिक परिधानों, आभूषणों और गोटा-पट्टी की पोशाकों से मनमोहक श्रृंगार (बनी ठनी रूप) किया जाता है, जो दर्शनार्थियों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र रहता है.

धार्मिक आयोजन व मेला: नवरात्र (चैत्र व आश्विन) के दौरान यहां विशेष मेले का आयोजन होता है, जिसमें पाली, जोधपुर, जालोर और सिरोही सहित राजस्थान भर से हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ते हैं.

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj