चरवाहे की आवाज से जमीन में ही रह गया माता का आधा स्वरूप, 1800 साल से मां के घुटनों की होती है पूजा

Last Updated:October 27, 2026, 07:09 IST
Darasiya Mata Dehrau Nagaur: राजस्थान के नागौर जिले के डेहरू गांव में स्थित डरासिया माता मंदिर अपनी 1800 साल पुरानी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है. यहां माता के पूरे स्वरूप की जगह केवल उनके घुटनों की पूजा की जाती है. मान्यता है कि जमीन से प्रकट होते समय चरवाहे की आवाज से प्रतिमा आधी ही बाहर आ सकी थी. यह मंदिर ब्राह्मण, राजपूत, जाट समेत कई समाजों की कुलदेवी का केंद्र है. कांच की खूबसूरत नक्काशी से सजा यह मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था और मन्नतों का प्रमुख स्थल है.
Nagaur: राजस्थान की धरती पर कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी मान्यताएं और परंपराएं लोगों को हैरान कर देती हैं. नागौर जिले के डेहरू गांव में स्थित डरासिया माता का मंदिर भी ऐसा ही एक अनूठा आस्था केंद्र है. यहां माता के पूरे स्वरूप के बजाय उनके केवल घुटनों की पूजा की जाती है. मान्यता है कि करीब 1800 साल पहले माघ शुक्ल सप्तमी के दिन माता की प्रतिमा जमीन से प्रकट हुई थी. मंदिर से जुड़ी इस अनूठी मान्यता और अलौकिक चमत्कार के कारण यहां दूर-दराज से लाखों श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं.
डरासिया माता के मंदिर से जुड़ी लोक कथा के अनुसार, करीब 1800 साल पहले माता की प्रतिमा जमीन से धीरे-धीरे बाहर प्रकट हो रही थी. उसी दौरान वहां से गुजर रहे एक चरवाहे ने अचानक आवाज लगा दी. मान्यता है कि चरवाहे की आवाज सुनते ही प्रतिमा का जमीन से बाहर निकलना रुक गया और माता का पूरा स्वरूप बाहर नहीं आ सका. इसके कारण प्रतिमा में केवल माता के घुटनों का हिस्सा ही धरातल पर दिखाई देता है. यही वजह है कि मंदिर में माता के घुटनों की पूजा करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. माघ शुक्ल सप्तमी का दिन मंदिर की मान्यता के लिहाज से विशेष महत्व रखता है.
कई समाजों और जातियों की कुलदेवी हैं डरासिया माताडेहरू गांव में स्थित यह मंदिर कई समाजों की अगाध आस्था का प्रमुख केंद्र है. ब्राह्मण समाज में पुरोहित जाति के लोग डरासिया माता को अपनी कुलदेवी मानते हैं. इसके साथ ही राजपूत समाज के लोग भी माता की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. इसके अलावा पुष्करणा पुरोहित समाज के साथ शीलगांव जाट, पोरवाला, दागड़िया और गिलड़ा समुदायों के लोगों की भी माता के प्रति गहरी आस्था है. यह मंदिर डेहरू, लालाप और मेड़ास के संयुक्त खेड़े में स्थित है. यहां विभिन्न समुदायों के श्रद्धालु अपनी परंपराओं के अनुसार माता के दर्शन करने, जात देने और मन्नत मांगने के लिए पहुंचते हैं.
कांच की नक्काशी, कलाकृतियां और मंदिर का आकर्षणडरासिया माता का मंदिर अपनी अनूठी धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ स्थापत्य कला और अद्भुत नक्काशी के लिए भी जाना जाता है. मंदिर के गर्भगृह में माता का मुख्य निज मंदिर स्थित है. पूरे परिसर में कांच की बेहद आकर्षक नक्काशी की गई है, जो मंदिर की भव्यता और सुंदरता को कई गुना बढ़ा देती है. वहीं, मंदिर के विशाल गुंबद पर विभिन्न देवी-देवताओं की सुंदर तस्वीरें और कलाकृतियां सजी हुई हैं. पारंपरिक शैली में बना यह भव्य मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है.
तालाब, कुआं और मन्नत का धागा बांधने की परंपरामंदिर परिसर में एक प्राचीन तालाब और कुआं भी बना हुआ है, जिसका धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्व माना जाता है. यहां आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर माता के दरबार में शीश नवाते हैं और परंपरा के अनुसार परिसर में मन्नत का धागा बांधते हैं. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, डरासिया माता के दरबार में मांगी गई हर सच्ची मन्नत पूरी होती है, जिससे श्रद्धालु सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं.
About the Authorvicky Rathore
Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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Nagaur,Nagaur,Rajasthan
First Published :
October 27, 2026, 07:09 IST



