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अरावली बची तो उदयपुर बचेगा! सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद उठी पर्यावरण बचाने की आवाज, सड़कों पर उतरे लोग

Last Updated:December 22, 2025, 12:52 IST

Udaipur Save Aravali Campaign: सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद अरावली पर्वत श्रृंखला को लेकर उदयपुर संभाग में विरोध तेज हो गया है. सामाजिक संगठन, पर्यावरण प्रेमी और आम लोग सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक अरावली बचाने की मुहिम चला रहे हैं. पर्यावरणविद् डॉ. अनिल मेहता के अनुसार अरावली उदयपुर के प्राकृतिक जल तंत्र की रीढ़ है. अगर पहाड़ियों को नुकसान पहुंचा तो झीलों, भूजल और स्थानीय जलवायु पर गंभीर असर पड़ेगा.

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उदयपुर: सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद अरावली पर्वत श्रृंखला को लेकर उदयपुर संभाग में विरोध लगातार तेज होता जा रहा है. अलग-अलग सामाजिक संगठन, पर्यावरण प्रेमी और आम लोग सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक अरावली को बचाने की मुहिम चला रहे हैं. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर #SaveAravali और #अरावली लगातार ट्रेंड कर रहे हैं. इसी बीच लोकल 18 ने उदयपुर के पर्यावरणविद् डॉ. अनिल मेहता से बातचीत कर यह जानने की कोशिश की कि इस फैसले का उदयपुर पर क्या असर पड़ सकता है.

डॉ. अनिल मेहता का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सीधा असर यहां के पर्यावरण पर पड़ेगा. उदयपुर की भौगोलिक बनावट ही इसकी सबसे बड़ी पहचान है. इसे प्राचीन काल में गिर्वा घाटी कहा जाता था. गिर्वा का अर्थ ही पहाड़ियां होता है. चारों ओर अरावली की पहाड़ियों से घिरा होने के कारण ही उदयपुर को झीलों का शहर और खूबसूरत शहर माना जाता है.

अरावली प्राकृतिक जल तंत्र की रीढ़ है

उन्होंने बताया कि अरावली की पहाड़ियां सिर्फ सुंदरता का कारण नहीं हैं, बल्कि यही पहाड़ियां यहां के प्राकृतिक जल तंत्र की रीढ़ है. इन्हीं पहाड़ियों से निकलने वाले प्राकृतिक जल स्रोतों ने पिछोला, फतेहसागर और उदयसागर जैसी ऐतिहासिक झीलों को जीवन दिया है. अरावली से ही यहां का वाटर सिस्टम जनरेट होता है. अगर पहाड़ियों को नुकसान पहुंचा तो इसका सीधा असर झीलों, भूजल स्तर और स्थानीय जलवायु पर पड़ेगा. डॉ. मेहता ने यह भी कहा कि इस फैसले को एक विशेष नीति के जरिए चुनौती दी जा सकती है. राजस्थान में पहाड़ियों को बचाने के लिए पहले से हिल्स पॉलिसी लागू की गई थी. इस नीति का उद्देश्य पहाड़ियों पर अंधाधुंध कटान, निर्माण और खनन को रोकना है.

उदयपुर संभाग में सेव अरावली को लेकर आंदोलन तेज

उन्होंने बताया कि हिल्स पॉलिसी के तहत कई क्षेत्रों में पहाड़ियों को संरक्षित रखा गया है, लेकिन अब इस फैसले के बाद उस पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं. उन्होंने एक अहम ऐतिहासिक तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाया. पुराने जमाने में कभी भी पहाड़ों को काटकर निर्माण नहीं किया गया. जो भी मंदिर, किले या ऐतिहासिक संरचनाएं हैं, वे पहाड़ों को नुकसान पहुंचाए बिना उन्हीं पर बनाई गई हैं. इसका मतलब है कि विकास और संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं. फिलहाल उदयपुर संभाग में सेव अरावली को लेकर आंदोलन और तेज होने के संकेत हैं. पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि अगर अरावली बची रही, तभी उदयपुर की पहचान, झीलें और भविष्य सुरक्षित रह पाएगा.

About the Authordeep ranjan

दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट…और पढ़ें

Location :

Udaipur,Rajasthan

First Published :

December 22, 2025, 12:52 IST

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