20 साल बाद ये कचरा उगलेगा ‘चांदी’, बन जाएगा 3700 करोड़ का उभरता मार्केट, रिपोर्ट solar scrap or Solar panel waste recycling market will hit 3700 crore by 2047 ceew studies reveal

Solar Scrap recycling: सौर ऊर्जा या सोलर पैनलों से निकला कचरा आने वाले भविष्य में चांदी उगलने वाला है. 20 साल बाद खराब या प्रयोग से बाहर हो चुके सौर पैनलों से न केवल चांदी, बल्कि तांबा, सिलिकॉन और एल्यूमिनियम जैसी धातुएं निकलेंगी जो न केवल दोबारा इस्तेमाल की जा सकेंगी बल्कि साल 2047 में इनका मार्केट ही 3,700 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा. यह जानकारी काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के दो नए स्वतंत्र अध्ययनों से सामने आई है.
ये स्टडीज बताती हैं कि अगर ये अनुमानित क्षमता हकीकत में बदलती है तो सौर कचरे में से कई कीमती धातुएं निकलेंगी. जिनसे 2047 तक इस क्षेत्र की विनिर्माण जरूरतों का 38 प्रतिशत हिस्सा पूरा किया जा सकता है. साथ में, नई सामग्री की जगह पर इन्हें ही दोबारा इस्तेमाल करने से 37 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन भी बचाया जा सकता है. ऐसे में यह दोहरा फायदा देने वाला है. हालांकि अभी भारत का सोलर मॉड्यूल रीसाइक्लिंग मार्केट बहुत प्रारंभिक चरण में है, जिसमें कुछ कमर्शियल रीसाइक्लर्स काम कर रहे हैं.
कितना निकलेगा कचरा सीईईडब्ल्यू के दोनों अध्ययन एक घरेलू सोलर रीसाइक्लिंग इकोसिस्टम बनाने के लिए भारत की पहली व्यापक रूपरेखा उपलब्ध कराते हैं, जो स्वच्छ ऊर्जा और विनिर्माण में आत्मनिर्भरता, दोनों का ही समर्थन करता है. अनुमान है कि 2047 तक भारत की स्थापित सौर क्षमता से 11 मिलियन टन से अधिक सौर कचरा निकल सकता है, जिसका अधिकांश हिस्सा क्रिस्टलीन-सिलिकॉन मॉड्यूल से होगा. इसके मैनेजमेंट के लिए देश भर में लगभग 300 रीसाइक्लिंग प्लांट्स और 4,200 करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत होगी.
सीईईडब्ल्यू के फेलो ऋषभ जैन कहते हैं, ‘भारत की सौर क्रांति एक नए हरित औद्योगिक अवसर को ताकत दे सकती है. अपनी स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों में सर्कुलैरिटी को शामिल करके, हम महत्वपूर्ण खनिजों को दोबारा हासिल कर सकते हैं, आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत बना सकते हैं, और हरित नौकरियां (green jobs) पैदा कर सकते हैं, साथ में, संभावित कचरे को स्थायी मूल्य में बदल सकते हैं. इस सर्कुलर इकोनॉमी (circular economy) का निर्माण भारत के लचीले और जिम्मेदारीपूर्ण विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.’
सीईईडब्ल्यू अध्ययन यह भी बताता है कि सौर पैनलों की रीसाइक्लिंग (solar recycling) की एक औपचारिक व्यवस्था आज भी जरूरी है, क्योंकि रीसाइक्लर्स को प्रति टन 10,000-12,000 रुपये का नुकसान हो रहा है. बड़े परिचालन खर्चों में बेकार या प्रयोग से बाहर हो चुके सोलर मॉड्यूल को दोबारा खरीदना है, जो कुल खर्च का लगभग दो-तिहाई (लगभग 600 रुपये प्रति पैनल) होता है.इसके बाद प्रोसेसिंग, कलेक्शन) और डिस्पोजल की लागत आती है. सौर पैनल रीसाइक्लिंग को लाभदायक बनाने के लिए, खराब मॉड्यूल की कीमत 330 रुपये से कम होनी चाहिए, या रीसाइक्लर्स को ईपीआर सर्टिफिकेट ट्रेडिंग, टैक्स राहत और सिलिकॉन व चांदी की कुशल पुनर्प्राप्ति के लिए शोध एवं विकास निवेश के जरिए मदद दी जानी चाहिए.
वहीं प्रोग्राम लीड आकांक्षा त्यागी कहती हैं, ‘सोलर रीसाइक्लिंग भारत की स्वच्छ ऊर्जा और विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं के बीच पुल बन सकती है. कचरा प्रबंधन से आगे, यह सरलता से सामग्री निकालने के लिए उपयुक्त पैनल डिजाइन करके, सामग्री की शुद्धता में सुधार लाकर और महत्वपूर्ण खनिजों के लिए नई वैल्यू चेन बनाकर, इनोवेशन का अवसर भी देता है. ईपीआर लक्ष्यों को लाने, सर्कुलर उत्पादों के लिए मांग पैदा करने, डेटा पारदर्शिता में सुधार लाने और रीसाइक्लिंग को ध्यान में रखकर उत्पादों को डिजाइन करने जैसे उपायों से भारत की सौर कचरे की चुनौती एक हरित उद्योग अवसर में बदल सकती है.’
भारत को आत्मनिर्भर बनाने में होगा बड़ा कदम रिसाइक्लिंग को विस्तार देने के लिए, सीईईडब्ल्यू के अध्ययन पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के नेतृत्व में ई-कचरा (प्रबंधन) नियम, 2022 के तहत संग्रहण और पुनर्प्राप्ति (collection and recovery) के लिए ईपीआर लक्ष्यों को लाने, और नीति, वित्त और उद्योग कार्रवाई में एकरूपता के लिए नई एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के तहत एक सर्कुलर सोलर टास्कफोर्स बनाने का सुझाव देते हैं। इममें वेस्ट हॉटस्पॉट का पता लगाने के लिए एक केंद्रीकृत सोलर इन्वेंट्री बनाने का भी सुझाव दिया गया है और निर्माताओं से सामग्री के आंकड़े साझा करने और आसानी से रिसाइकिल होने वाले मॉड्यूल बनाने का आग्रह किया गया है. एक साथ मिलकर ये कदम एक मजबूत संग्रह प्रणाली बनाएंगे, सामग्री को दोबारा हासिल करने में अनुसंधान व विकास को बढ़ावा देंगे और भारत के अक्षय ऊर्जा मिशनों में सर्कुलरिटी को भी शामिल करेंगे, ताकि स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन संसाधनों के मामले में लचीला और आत्मनिर्भर बना रहे.



