Agriculture Tips: सर्दी में प्याज की फसल पर बड़ा खतरा! इस चीज से बचाव नहीं किया तो हो सकता है भारी नुकसान

Last Updated:January 08, 2026, 15:55 IST
Pyaaj Ki Kheti : सीकर के रसीदपुरा गांव में प्याज की खेती प्रसिद्ध है, जहां थ्रिप्स और परपल ब्लॉच रोग से बचाव के लिए दिनेश जाखड़ ने निगरानी, दवा और प्राकृतिक उपाय सुझाए हैं. एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ ने बताया कि किसान प्याज की फसल में थ्रिप्स के आक्रमण की निरंतर निगरानी करते रहें. यह कीट फसल को भारी नुकसान पहुंचाते हैं इससे उत्पादन में भी गिरावट आ जाती है वहीं उनकी क्वालिटी भी डाउन हो जाती है. अगर समय पर ध्यान नहीं दिया जाए तो यह समस्या गंभीर बनाकर पूरी फसल को चौपट कर सकती है.
Agriculture Tips: राजस्थान का सीकर जिला प्याज की खेती के लिए मशहूर है. यहां के रसीदपुरा गांव को प्याज उत्पादन के चलते प्याज वाला गांव भी कहा जाता है. सीकर के प्याज में मिठास होने के कारण यहां के प्याज अन्य राज्यों में भी जाते हैं. अभी किसानों के खेतों में प्याज के पौधे बड़े हो रहे हैं. ऐसे में कड़ाके की सर्दी और बदलते मौसम में थ्रिप्स कीटों का कीटों का प्रकोप बढ़ रहा है. ऐसे में किसानों को समय में इस समस्या का समाधान करने की जरूरत है.

एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ ने बताया कि किसान प्याज की फसल में थ्रिप्स के आक्रमण की निरंतर निगरानी करते रहें. यह कीट फसल को भारी नुकसान पहुंचाते हैं इससे उत्पादन में भी गिरावट आ जाती है वहीं उनकी क्वालिटी भी डाउन हो जाती है. अगर समय पर ध्यान नहीं दिया जाए तो यह समस्या गंभीर बनाकर पूरी फसल को चौपट कर सकती है. उन्होंने बताया कि थ्रिप्स के अलावा परफ्ल ब्लोस रोग का खतरा भी सर्दी के मौसम में प्याज की फसल में अधिक रहता है.

एग्रीकल्चर एक्सपर्ट के यह रोग फफूंद जनित होता है, जिसमें पत्तियों पर बैंगनी-भूरे रंग के धब्बे बनते हैं, जो धीरे-धीरे फैलकर पत्तियों को सुखा देते हैं. अधिक नमी, लगातार ओस, घना रोपण और संतुलित पोषण की कमी से रोग का प्रकोप तेजी से बढ़ता है, जिससे कंद का आकार और उपज दोनों प्रभावित होते हैं.
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उन्होंने बताया कि, परपल ब्लॉच से बचाव के लिए सबसे पहले स्वस्थ व रोगमुक्त बीज का चयन करें. खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था रखें, ताकि नमी अधिक समय तक न ठहरे. इसके अलावा नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश का प्रयोग करें और अधिक नाइट्रोजन देने से बचें. इसके अलावा फसल में पौधों की उचित दूरी रखें, जिससे हवा का संचार बना रहे. इसके अलावा ध्यान रहे कि संक्रमित पत्तियों को समय-समय पर निकालकर नष्ट करना भी बेहद जरूरी है.

रोग के लक्षण दिखाई देते ही डाएथेन-एम-45 @ 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में किसी चिपकने वाले पदार्थ जैसे टीपोल @ 1 ग्राम प्रति लीटर घोल मिलाकर छिड़काव करें. इसके अलावा मैन्कोज़ेब या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड आधारित फफूंदनाशकों का 7 से 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव लाभकारी रहता है. रसायनों का प्रयोग हमेशा कम मात्रा में करें और एक ही दवा का बार-बार उपयोग न करें.

एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ ने बताया कि प्राकृतिक नियंत्रण के लिए नीम की खली का प्रयोग खेत में करें, इससे मिट्टी में रोगकारक फफूंद की सक्रियता कम होती है. नीम तेल 3 से 5 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से भी रोग का प्रभाव घटता है. इसके अलावा गोमूत्र आधारित घोल या छाछ का 10 प्रतिशत घोल पत्तियों पर छिड़कने से फफूंद जनित रोगों में काफी हद तक रोकथाम होती है.
First Published :
January 08, 2026, 15:55 IST
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सर्दी में प्याज की फसल पर बड़ा खतरा! इस चीज करें बचाव, वरना होगा भारी नुकसान


