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Alwar Potters’ Clay Diyas Shine Across India Diwali 2025

Last Updated:October 18, 2025, 09:43 IST

Diwali 2025: अलवर के कुंभकारों द्वारा बनाए गए मिट्टी के दीपक, कलश और सजावटी सामान की देशभर में मांग बढ़ गई है. दिल्ली, मुंबई, जयपुर सहित कई राज्यों में इन उत्पादों की सप्लाई की जा रही है. चिकनी मिट्टी की कमी और उत्पादन लागत बढ़ने की चुनौतियों के बावजूद, कुशल कारीगर अपनी कला से दीपावली 2025 में देश के हर कोने तक रोशनी पहुंचा रहे हैं, जिसमें इलेक्ट्रिक चाक का प्रयोग सहायक सिद्ध हो रहा है.

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अलवर: दीपावली 2025 के मौके पर अलवर जिले के कुंभकार अपनी अनोखी कला और चिकनी मिट्टी से बनाए जाने वाले बर्तनों के लिए देशभर में प्रसिद्ध हैं. दीपावली के त्यौहार के पहले ही इन कुशल कारीगरों द्वारा तैयार किए गए मिट्टी के दीपक, कलश, गमले और सजावटी सामान की मांग तेजी से बढ़ जाती है, जिसने स्थानीय कला को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है.

अलवर के कुंभकारों की मेहनत और परंपरा ने इस कला को एक व्यावसायिक ऊँचाई दी है. यहां से बड़ी मात्रा में मिट्टी के दीपक और सजावटी सामान देश के प्रमुख शहरों और राज्यों में भेजे जाते हैं:
प्रमुख बाजार: दिल्ली, मुंबई, जयपुर, भोपाल, पुणे, झज्जर और रेवाड़ी सहित कई राज्यों में अलवर के मिट्टी के उत्पाद अपनी विशेष गुणवत्ता और सुंदरता के कारण लोकप्रिय हैं.
कला का सम्मान: कुंभकारों की मेहनत यह सुनिश्चित करती है कि त्योहारों पर भारतीय कला और परंपरा की रोशनी देश के हर कोने तक पहुंचे.

उत्पादन में चुनौतियां और बढ़ी लागत
जहां एक ओर देशभर से ऑर्डर आ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुंभकारों को उत्पादन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है:
मिट्टी की उपलब्धता: कुंभकारों का कहना है कि लगातार हुई बारिश के कारण चिकनी मिट्टी की उपलब्धता कम हो गई है.
महंगाई: पहले पर्याप्त मात्रा में मिट्टी सस्ती मिलती थी, लेकिन अब कच्चे माल की कीमत बढ़ने के कारण वह महंगे दामों पर ही उपलब्ध है.
बढ़ी लागत: कच्चे माल की लागत बढ़ने के चलते उत्पादन की लागत बढ़ गई है. अब 100 दीपक बनाने में कुंभकार को करीब 60 रुपये खर्च करने पड़ते हैं.

इन चुनौतियों की वजह से देशभर से आ रहे बम्पर ऑर्डरों को समय पर पूरा करना एक बड़ी चुनौती बन गया है.

तकनीक और पारंपरिक कला का संगम

अलवर शहर के कुंभकार दिनेश बताते हैं कि समय के साथ तकनीक में बदलाव आया है.
आधुनिक चाक: पहले पत्थर के चाक से बिना बिजली के बर्तन बनाए जाते थे, जिससे उत्पादन धीमा होता था. अब इलेक्ट्रिक चाक के उपयोग से उत्पादन आसान और तेज हो गया है.
बढ़ती मांग: हालांकि, तकनीक के उपयोग के बावजूद भी बढ़ती मांग के कारण सभी ऑर्डर पूरे नहीं हो पा रहे हैं, जो इस बात का संकेत है कि देश में स्वदेशी उत्पादों के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है.

अलवर की मिट्टी की खासियत और विरासत
अलवर की मिट्टी अपनी चिकनाई और लचीलेपन के लिए प्रसिद्ध है. इससे बने बर्तन और सजावटी सामान सुंदर, हल्के और बेहद टिकाऊ होते हैं. यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही है, और आज भी अलवर, खैरथल, तिजारा, किशनगढ़ बास, हरसोली, मातौर और पहेल में कई परिवार इसे जीवित रखे हुए हैं.

दीपावली में अलवर की चमक
दीपावली से पहले शहर के व्यापारी बड़े पैमाने पर दीपक, कलश और सजावटी सामान खरीदकर देशभर में भेजते हैं. अनुमान है कि इस बार खैरथल, तिजारा, किशनगढ़ बास और आसपास के इलाकों में बनाए गए करीब 20 लाख से अधिक मिट्टी के दीपक जलाकर दीपावली मनाई जाएगी. कुंभकारों को उम्मीद है कि इस बार बिक्री में और तेजी आएगी और उनके घरों में दीपावली की रोशनी पहले से अधिक चमकेगी. अलवर की मिट्टी और कुशल कारीगर देशभर में राजस्थान की कला और परंपरा की पहचान बढ़ा रहे हैं.
Location :

Alwar,Alwar,Rajasthan

First Published :

October 18, 2025, 09:43 IST

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अलवर के कुंभकारों की मेहनत रंग लाई, देशभर में छा रहे दीपक, बिक्री में तेजी

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