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Last Updated:January 06, 2026, 17:51 IST
Dharohar: भीलवाड़ा में स्थित 32 खंभों की छतरी आमेर राजघराने की ऐतिहासिक धरोहर का अहम हिस्सा है. इस छतरी का निर्माण राजसी शैली में हुआ और यह वास्तुकला प्रेमियों के लिए एक अनूठा आकर्षण है. आमेर राजघराने का भीलवाड़ा से गहरा नाता इसे और भी विशेष बनाता है. पर्यटक यहाँ इसकी भव्यता और सौंदर्य का आनंद लेने के साथ ही सेल्फी लेने के लिए भी आते हैं. यह स्थल न केवल इतिहास और संस्कृति की जानकारी देता है, बल्कि राजस्थान की समृद्ध विरासत और शाही वास्तुकला का जीवंत अनुभव भी प्रदान करता है.
भीलवाड़ा: भीलवाड़ा जिले के मांडल कस्बे में स्थित 32 खंभों की छतरी न केवल एक ऐतिहासिक धरोहर है बल्कि आमेर राजघराने और मेवाड़ के इतिहास से जुड़े महत्वपूर्ण किस्से का साक्षी भी है. जिला मुख्यालय से करीब 14 किलोमीटर दूर मेजा रोड पर स्थित यह छतरी अपनी भव्य स्थापत्य कला और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण पर्यटकों के लिए खास आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. संगमरमर से निर्मित यह स्मारक आज जिले की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है और पर्यटक इसे बेहतरीन सेल्फी पॉइंट के रूप में भी पसंद कर रहे हैं.
स्थानीय इतिहासकार सुरेश कुमार ने बताया कि 32 खंभों की इस छतरी का निर्माण आमेर के शासक भारमल के दूसरे पुत्र जगन्नाथ कछवाहा की स्मृति में कराया गया था. कहा जाता है कि महाराणा प्रताप को पकड़ने के उद्देश्य से जगन्नाथ कछवाहा मुगल सेना के साथ मेवाड़ क्षेत्र में आए थे. 1608 ईस्वी में मांडल क्षेत्र में मुगल सेना के विश्राम के दौरान मेवाड़ की सेना ने आक्रमण किया, जिसमें मुगलों को पराजय का सामना करना पड़ा. इस युद्ध में जगन्नाथ कछवाहा, नारायणदास राव खंगार सहित कई योद्धा शहीद हुए थे. इसके बाद उनका अंतिम संस्कार यहीं इसी जगह पर करवाया और इन्ही वीरों की स्मृति को चिर-स्थायी बनाने के लिए बाद में इस छतरी का निर्माण कराया गया.
32 खंभों की छतरी हिंदू स्मारक होने के बावजूद मुगल स्थापत्य कला की झलक प्रस्तुत करती है, जो उस कालखंड की सांस्कृतिक समन्वय की मिसाल है. संगमरमर के खंभे, छत की नक्काशी और संरचना की संतुलित बनावट इसे स्थापत्य की दृष्टि से भी खास बनाती है.
32 खंभों की छतरी भीलवाड़ा जिले की एक अनमोल धरोहरइतिहासकार सुरेश कुमार का कहना हैं कि यह स्मारक 17वीं सदी के आरंभ में निर्मित हुआ और बाद में यहां सिद्धेश्वर महादेव की स्थापना की गई थी. इसके बाद से यह स्थान शिवालय के रूप में भी जाना जाने लगा. समय के साथ यह ऐतिहासिक छतरी धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बन गई. वर्तमान में सिद्धेश्वर महादेव मंदिर सेवा समिति द्वारा इस धरोहर के संरक्षण और विकास के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं. यहां पर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ दूर-दराज से लोग भी आते हैं धार्मिक आयोजनों के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं, जिससे मांडल क्षेत्र की सांस्कृतिक गतिविधियों में भी वृद्धि हो रही है. आज 32 खंभों की छतरी भीलवाड़ा जिले की एक अनमोल धरोहर के रूप में पहचानी जाती है.
इतिहास, स्थापत्य, आस्था और पर्यटन का यह संगम न केवल आमेर राजघराने और मेवाड़ के गौरवशाली अतीत की कहानी कहता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी इतिहास को जीवंत बनाए रखने का कार्य कर रहा है.
About the AuthorJagriti Dubey
With more than 6 years above of experience in Digital Media Journalism. Currently I am working as a Content Editor at News 18 in Rajasthan Team. Here, I am covering lifestyle, health, beauty, fashion, religion…और पढ़ें
Location :
Bhilwara,Rajasthan
First Published :
January 06, 2026, 17:51 IST
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आमेर राजघराने का भीलवाड़ा से नाता, 32 खंभों की छतरी बनी पर्यटकों का पॉइंट



