शादी के फेरे खत्म होते ही दुलहन के पैरों में सजती है बिछिया, जानें राजस्थान में इसे क्यों माना जाता है खास

Last Updated:December 12, 2025, 08:02 IST
भारतीय विवाह परंपरा में बिछिया का महत्व: भारतीय विवाह परंपरा में बिछिया दुलहन के श्रृंगार का अहम हिस्सा है और इसे सुहाग की पवित्र निशानी माना जाता है. राजस्थान और उत्तर भारत में शादी के फेरे पूरे होने के बाद दूल्हा-दुलहन को बिछिया पहनाता है. यह न सिर्फ वैवाहिक जीवन और रिश्ते की नई जिम्मेदारी का प्रतीक है, बल्कि आयुर्वेदिक दृष्टि से महिलाओं के हार्मोन संतुलन और प्रजनन स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है. ग्रामीण इलाकों में बिछिया के पारंपरिक डिज़ाइन आज भी लोकप्रिय हैं और नई पीढ़ी की दुलहनें इसे गर्व से अपनाती हैं.
भारतीय विवाह परंपराओं में दुलहन का श्रृंगार सिर्फ सुंदरता का प्रतीक नहीं, बल्कि संस्कार और आस्था से जुड़ा अहम हिस्सा है.इन्हीं में से एक है बिछिया, जिसे पैरों की अंगुलियों में पहनाया जाता है और इसे सुहाग की सबसे पवित्र निशानी माना जाता है. राजस्थान ही नहीं, पूरे उत्तर भारत में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है. शादी के फेरे पूरे होते ही दूल्हा अपनी दुलहन को बिछिया पहनाता है, जो यह दर्शाता है कि दुलहन अब वैवाहिक जीवन की नई जिम्मेदारियों और रिश्ते से जुड़ चुकी है.

राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत में सोलह श्रृंगार का विशेष महत्व है. माना जाता है कि विवाह के अवसर पर दुलहन जब इन 16 श्रृंगारों से सजी होती है, तो उसका सौंदर्य और तेज और भी बढ़ जाता है. इनमें से मांग-टीका, नथ, बाजूबंद, कंगन, पायल, मेहंदी और सिंदूर की तरह बिछिया भी एक अनिवार्य हिस्सा है. पारंपरिक मान्यता के अनुसार, बिछिया पहनने से न सिर्फ सुहाग की रक्षा होती है, बल्कि यह महिला के विवाहित होने की पहचान भी होती है.

बिछिया पहनने के पीछे धार्मिक और आयुर्वेदिक दोनों कारण जुड़े हैं. विवाह संस्कार में इसे पति-पत्नी के बीच प्रेम और निष्ठा का प्रतीक माना जाता है. वहीं, आयुर्वेद में माना गया है कि पैर की दूसरी अंगुली में चांदी की बिछिया पहनने से महिलाओं के हार्मोन संतुलन में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और प्रजनन स्वास्थ्य बेहतर होता है. इसी वजह से बिछिया को सिर्फ चांदी में पहनने की परंपरा रही है.
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राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में आज भी बिछिया के डिजाइनों में पारंपरिक कारीगरी देखने को मिलती है. दुलहनें अपने लहंगे, पायल और अन्य आभूषणों के साथ मैचिंग बिछिया चुनती हैं. कई स्थानों पर विवाह के अगले दिन ‘पग फेर’ की रस्म के दौरान भी बिछिया दिखाना शुभ माना जाता है.

समय के साथ दुलहनों के पहनावे और आभूषणों में आधुनिकता आई है, लेकिन बिछिया की परंपरा आज भी उतनी ही मजबूत है जितनी पहले थी. नई पीढ़ी की दुलहनें भी इस सुहाग चिह्न को गर्व के साथ अपनाती हैं. यही वजह है कि राजस्थान की 16 श्रृंगार परंपरा में बिछिया का स्थान आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

बिछिया न सिर्फ एक आभूषण है, बल्कि वैवाहिक जीवन की शुरुआत का संस्कार, सुहाग का प्रतीक और सदियों पुरानी परंपरा की विरासत है, जो हर दुलहन के कदमों में बसती है. आज भी शादी के साथ फेरे लेने के साथ ही महिलाओं को यह खास आभूषण पहना कर ही ससुराल भेजा जाता है.
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December 12, 2025, 08:02 IST
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शादी के फेरे खत्म होते ही दुलहन के पैरों में सजती है बिछिया, जानें इसका महत्व



