| Bawliya Baba Story | Rajasthan News |

सीकर. शेखावाटी की तपोभूमि हमेशा से संत, विद्वान और त्यागमूर्ति तपस्वियों की कर्मभूमि रही है. इसी पवित्र भूमि पर जन्मे चमत्कारी संत परमहंस गणेशनारायण बावलिया बाबा आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बने हुए हैं. लोग उन्हें प्रेम और श्रद्धा से बावळिया बाबा कहकर पुकारते हैं. अपने तप, सिद्धियों और दिव्य आशीर्वाद के कारण उनकी महिमा राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के कई राज्यों में गाई जाती है. शेखावाटी के नगरदेव के रूप में पूजित इस संत का जन्म विक्रम संवत 1903 पौष बदी प्रतिपदा गुरुवार को झुंझुनूं जिले के बुगाला गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. पिता घनश्यामदास और माता गौरा देवी ने उन्हें धार्मिक संस्कारों से भरपूर वातावरण दिया जिसने आगे चलकर उनके अध्यात्मिक जीवन की नींव रखी.
ब्राह्मण परिवार में जन्म होने के कारण बावळिया बाबा ने कम उम्र में ही वेद, व्याकरण और ज्योतिष में दक्षता प्राप्त कर ली थी. पूजा, जप और अनुष्ठानों के माध्यम से वे अपना जीवनयापन करते थे. कहा जाता है कि नवरात्रि में देवी मां की पूजा करते समय अचानक एक व्यवधान आया जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी. उसी क्षण उन्होंने गृहस्थ जीवन का त्याग कर दिया और पूर्ण रूप से ईश्वर भक्ति में लीन हो गए. गृहस्थ जीवन छोड़ने के बाद वे गुढ़ागौड़जी की पहाड़ियों में चले गए जहां उन्होंने लगभग 13 माह तक कठोर तप साधना की.
श्मशान में तप, शिवनगरी में धामगुढ़ागौड़जी में तपस्या पूरी करने के बाद बाबा जसरापुर पहुंचे और वहां श्मशान घाट को ही अपना निवास बना लिया. कई दिन तप करने के बाद वे चिड़ावा आए और शिवनगरी नामक स्थान पर अपना स्थायी धाम बनाया. यहीं उन्होंने अघोर साधना में प्रवेश कर पूर्ण अघोरी स्वरूप धारण किया. वे मां दुर्गा के परम उपासक थे और निरंतर दुर्गा बीज मंत्र का जाप करते रहते थे. कहा जाता है कि उनके मुख से निकला हर वचन सत्य सिद्ध होता था. अनिष्ट की घटनाओं के बारे में पूर्व संकेत मिलने से कुछ लोग भयभीत भी रहते थे, पर असंख्य लोग उनके भक्त बनकर सेवा में लग जाते थे. कुछ लोग उनके अलौकिक स्वरूप को न समझ पाने के कारण उन्हें बावलियो पंडित कहने लगे, लेकिन समय ने सिद्ध किया कि वे सिद्ध पुरुष थे. संवत 1969 पौष शुक्ल नवमी गुरुवार को वे शिवनगरी के शिव मंदिर प्रांगण में समाधिस्थ हो गए.
बिड़ला परिवार पर विशेष कृपाबावळिया बाबा के जीवन में कई चमत्कार जुड़े हुए हैं. पिलानी के सेठ जुगल किशोर बिड़ला उनके प्रति विशेष भक्ति रखते थे. बिड़ला रोजाना चिड़ावा पहुंचकर बाबा के दर्शन किए बिना भोजन नहीं करते थे. उनके सेवाभाव से प्रसन्न होकर बाबा ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम्हारे घर की करणी-बरणी सदैव चलती रहे. कहा जाता है कि इसी आशीर्वाद का फल है कि बिड़ला परिवार ने उद्योग और व्यापार में अपार सफलता हासिल की. बिड़ला ने कई बार उन्हें पिलानी चलने का आग्रह किया, लेकिन बाबा ने कभी स्वीकार नहीं किया. इसी कारण बिड़ला ने संवत 1959 में चिड़ावा में एक जोहड़ खुदवाकर घाट और एक विशाल गणेश लाट नामक स्तूप का निर्माण करवाया.
देशभर में बढ़ती आस्था और मंदिरों का विस्तार
बावा बावलिया बाबा के चमत्कारों और उनके प्रति बढ़ती श्रद्धा ने देशभर में उनके मंदिरों की संख्या बढ़ा दी है. जन्मस्थली बुगाला, विद्यास्थली नवलगढ़, तपोस्थली गुढ़ागौड़जी और समाधिस्थली चिड़ावा उनके प्रमुख धाम हैं. इसके अलावा खेतड़ी, पिलानी, मुकुंदगढ़, बांसा, घोड़ीवारा, बास, नानग, कुचामन, कोलकाता, हैदराबाद, अहमदाबाद, ग्वालियर, सूरत और मुंबई में भी उनके मंदिर स्थित हैं. बुगाला की पैतृक हवेली को म्यूजियम का रूप दिया गया है जहां बाबा की उपयोग की गई वस्तुएं, स्मृति चिह्न और हवेली की पारंपरिक संरचना को संरक्षित रखा गया है. इस म्यूजियम का निर्माण बावलिया बाबा मेमोरियल ट्रस्ट मुंबई द्वारा करवाया गया है.



