Rajasthan

लाभ, बुवाई और देखभाल के तरीके

 नागौर. असालिया अब राजस्थान और अन्य सूखे-क्षेत्रों के किसानों के लिए आकर्षक नकदी फसल बनकर उभरी है. यह छोटा लेकिन पौष्टिक पौधा अब खेत से लेकर बाजार तक चर्चा में है. इसकी बढ़ती मांग घरेलू औषधियों, हेल्थ प्रोडक्ट्स और फूड इंडस्ट्री दोनों में देखी जा रही है. जिससे किसानों ने पारंपरिक गेहूं-चना जैसी फसलों के साथ अब असालिया को भी अपनाना शुरू कर दिया है. असालिया एक तंग-बीज वाली जड़ी-बूटी है, जिसके बीज बेहद पौष्टिक और व्यावसायिक रूप से उपयोगी होते हैं.

इन्हें सूखा या पाउडर बनाकर खाद्य सप्लीमेंट, आयुर्वेदिक दवाइयों, और एनर्जी ड्रिंक जैसे उत्पादों में प्रयोग किया जाता है. यही वजह है कि इसके बीज का बाजार मूल्य अच्छा रहता है, और किसानों के लिए यह फसल कम लागत में ज्यादा आमदनी का साधन बन रही है. असालिया की खेती की सफलता उसकी सही बुवाई और प्रबंधन तकनीक पर निर्भर करती है. यह फसल ठंडे मौसम की होती है, इसलिए इसकी बुवाई का समय, मिट्टी की तैयारी और सिंचाई व्यवस्था अगर ठीक से की जाए, तो बहुत अच्छी उपज प्राप्त होती है.

बुवाई का सही समयअसालिया की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय अक्टूबर से दिसंबर तक माना जाता है. रबी मौसम की यह फसल ठंड में अच्छी तरह बढ़ती है और हल्की नमी में बेहतर अंकुरण देती है. अगर कोई किसान जल्दी बुवाई कर देता है (सितंबर के आखिर में), तो पौधे जल्दी फूलने लगते हैं जिससे बीजों की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है, इसलिए सबसे अच्छा समय है अक्टूबर के मध्य से लेकर नवंबर के अंत तक. असालिया को ठंडा और शुष्क मौसम पसंद है. इसके विकास के लिए 18°C से 25°C का तापमान आदर्श माना गया है. ज्यादा गर्मी या अत्यधिक ठंड दोनों ही परिस्थितियां इसके विकास को प्रभावित कर सकती हैं. सर्दी के मौसम में इसकी खेती उन इलाकों में की जाती है जहां हल्की धूप और रात में ठंडक रहती है.

मिट्टी की तैयारीअसालिया की फसल के लिए हल्की-दोमट या दोमट मिट्टी सबसे बेहतर मानी जाती है.मिट्टी में पानी निकासी की व्यवस्था अच्छी होनी चाहिए, क्योंकि जलभराव इसकी जड़ों को सड़ा सकता है. खेती से पहले खेत को 2–3 बार हल्की जुताई करें और फिर पाटा/ पटास चलाकर मिट्टी को समतल कर दें. जुताई के समय प्रति बीघा 2–3 टन गोबर की सड़ी हुई खाद मिलाना लाभकारी रहता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और बीज अंकुरण बेहतर होता है. बुवाई के लगभग 15–20 दिन बाद जब पौधे 8–10 सेंटीमीटर ऊंचे हो जाएं, तब पहली निराई-गुड़ाई करनी चाहिए.इससे खरपतवार हट जाते हैं और पौधों को पर्याप्त पोषक तत्व मिलते हैं.अगर खेत में ज्यादा खरपतवार उगते हैं तो दूसरी निराई 10 दिन बाद कर लें.फूल आने की अवस्था में खेत को सूखा और हवादार रखें, इससे बीज अच्छी तरह पकते हैं.

फसल तैयार होने का समयबुवाई के लगभग 45 से 50 दिन बाद फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है.बीजों के पकने पर पौधों का रंग हल्का भूरा हो जाता है, तब उन्हें काटकर धूप में सुखाया जाता है.बीज सूखने के बाद छानकर अच्छी तरह पैक करें ताकि उनमें नमी न रहे. असालिया की बुवाई में बहुत कम मेहनत और पानी लगता ह बीज की मात्रा कम लगती है, इसलिए लागत भी घट जाती है.यह फसल हर प्रकार की हल्की मिट्टी में उगाई जा सकती हैजल्दी तैयार होने से किसान इसे रबी और खरीफ दोनों सीजन के बीच भी लगा सकते हैं.

बुवाई के सही तरीके अपनाने पर उपज और मुनाफा दोनों बढ़ते हैं. असालिया की खेती में बीज, खाद और सिंचाई का खर्च बहुत कम होता है.एक एकड़ में किसानों को लगभग 10–15 हजार रुपये तक शुद्ध मुनाफा हो सकता है.यह फसल सिर्फ 45 दिन में तैयार हो जाती है, जिससे किसान साल में दो से तीन बार इसे उगा सकते हैं.पारंपरिक फसलों के बीच इंटरक्रॉपिंग करके भी इसे लगाया जा सकता है.

असालिया के बीजों में आयरन, कैल्शियम, फाइबर, ओमेगा-3 फैटी एसिड और प्रोटीन प्रचुर मात्रा में होते हैं.यह रक्त की कमी, हड्डियों की कमजोरी, थकान, और महिलाओं में दूध की कमी को दूर करने में मदद करता है.बीजों का सेवन प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और शरीर को अंदर से मजबूत बनाता है.असालिया के बीज से बने लड्डू या पेय पदार्थ शरीर को ऊर्जा देते हैं और मांसपेशियों को स्वस्थ रखते हैं.

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