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Last Updated:November 29, 2025, 12:06 IST

Desi Furniture Bharatpur: भरतपुर के खाली मैदानों में उगने वाली साधारण खरपतवार अब स्थानीय लोगों के लिए कमाई का बड़ा साधन बन गई है. इन घासों का उपयोग देसी फर्नीचर, झोपड़ियां और गांवों की पारंपरिक झोपड़ीनुमा संरचनाएं बनाने में बढ़ने लगा है. कम लागत में तैयार होने वाला यह प्राकृतिक मटेरियल मार्केट में खूब लोकप्रिय हो रहा है और ग्रामीणों की आय में इजाफा कर रहा है.

भरतपुर: भरतपुर के खाली पड़े मैदानों में स्वाभाविक रूप से उगने वाली एक खास खरपतवार इन दिनों ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए नया सहारा बन गई है.यह घास जो बिना किसी देखभाल के सिर्फ एक से डेढ़ महीने में तैयार हो जाती है. आज स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आय का नया माध्यम बन रही है.पहले जिसे बेकार समझकर खेतों से हटा दिया जाता था आज वही घास भरतपुर के कई गांवों में देसी फर्नीचर और घरेलू सामग्रियों के निर्माण की प्रमुख कड़ी बन चुकी है.

ग्रामीण कारीगरों के अनुसार यह घास बेहद हल्की मजबूत और टिकाऊ होती है. इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि यह प्राकृतिक रूप से ईको फ्रेंडली है और इससे बने सामान लंबे समय तक चलने वाले होते हैं. गांवों में कारीगर इस घास को काटकर सुखाते है और फिर उससे विभिन्न तरह के घरेलू उपयोग के उत्पाद तैयार किए जाते हैं. इनमें देसी मूंडे-मुंडी, चौकियां, झोपड़ियों की छतें, साधारण टेबल, टोकरियां और कई प्रकार के पारंपरिक सामान शामिल हैं.

स्थानीय कारीगर बताते हैं कि बाजारों में प्लास्टिक और केमिकल से बने सामानों की जगह अब लोग प्राकृतिक और देसी आइटम ज्यादा पसंद कर रहे हैं. इस बदलते रुझान का फायदा सीधे ग्रामीणों को मिल रहा है. जहां एक मूंडा या मुंडी तैयार करने में बहुत कम लागत आती है, लेकिन बाजार में इसे 150 से 400 रुपये तक में आसानी से बेचा जा सकता है. वहीं इसी घास से तैयार छोटी टेबल और स्टूल शहरों के हैंडीक्राफ्ट बाजारों में भी मांग पकड़ रहे हैं. भरतपुर के कई क्षेत्रों जैसे वैर, कुम्हेर, रूपवास और आसपास के गांवों—में यह घास बड़ी मात्रा में उगती है.

ग्रामीणों के लिए यह घास दोहरा फायदा देतीकिसान बताते हैं कि बारिश के बाद यह खरपतवार तेजी से फैल जाती है.और इसके लिए किसी खाद पानी या देखभाल की जरूरत नहीं होती ग्रामीणों के लिए यह घास दोहरा फायदा देती है. एक तरफ मैदान साफ रहते हैं. वहीं दूसरी तरफ इससे अच्छी आमदनी भी हो जाती है. पारंपरिक शिल्प को बढ़ावा देने की दिशा में कदम उठा रही हैं. कुल मिलाकर भरतपुर की यह खास घास न सिर्फ ग्रामीण जीवन में आर्थिक मजबूती ला रही है, बल्कि पारंपरिक देसी कला और इको-फ्रेंडली जीवनशैली को भी नया प्रोत्साहन दे रही है.

About the AuthorJagriti Dubey

With more than 6 years above of experience in Digital Media Journalism. Currently I am working as a Content Editor at News 18. Here, I am covering lifestyle, health, beauty, fashion, religion, career, politica…और पढ़ें

Location :

Bharatpur,Rajasthan

First Published :

November 29, 2025, 12:06 IST

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जिसे लोग समझते थे बेकार, वही बन गई भरतपुर में कमाई का जरिया, जानें कैसे

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