नए साल में कोटा को बड़ी सौगात! 1.5 लाख लोगों को मिली राहत; चंबल घड़ियाल अभयारण्य से 732 हेक्टेयर क्षेत्र मुक्त

कोटा. नए साल की शुरुआत में कोटा शहर के लाखों निवासियों को बड़ी राहत मिली है. केंद्र सरकार ने राजस्थान सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य की सीमा में बदलाव किया है. कोटा बैराज से हैंगिंग ब्रिज तक के इलाके को अभयारण्य से मुक्त कर दिया गया है, जिसमें कुल 732 हेक्टेयर क्षेत्र को डिनोटिफाई किया गया है. वन विभाग ने इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी है. इस फैसले से शहर के 1.5 लाख से अधिक लोगों को लाभ होगा, जिनमें किशोरपुरा, शिवपुरा और सकतपुरा सहित कई कॉलोनियों के निवासी शामिल हैं.
यह क्षेत्र वर्षों से अभयारण्य की सीमा में आने के कारण विकास कार्यों और संपत्ति अधिकारों में बाधा बन रहा था. अब 40 हजार से ज्यादा घरों को पट्टे जारी किए जा सकेंगे, जिससे इन परिवारों में खुशी की लहर दौड़ गई है. स्थानीय निवासियों का कहना है कि दशकों से पट्टे नहीं मिलने के कारण वे बैंक लोन, संपत्ति बिक्री या अन्य सुविधाओं से वंचित थे. इस डिनोटिफिकेशन से न केवल आवासीय पट्टे मिलेंगे, बल्कि क्षेत्र में बुनियादी विकास कार्य जैसे सड़कें, पानी, बिजली और सीवरेज जैसी सुविधाएं भी तेजी से पूरी हो सकेंगी.
तीन राज्यों तक फैला हुआ है राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य
राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा पर फैला हुआ है, जो मुख्य रूप से लुप्तप्राय घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन और लाल मुकुट वाली कछुओं की रक्षा के लिए बनाया गया था. कोटा में यह अभयारण्य चंबल नदी के किनारे फैला हुआ था, जहां हैंगिंग ब्रिज से कोटा बैराज तक का हिस्सा शहरीकरण के दबाव में था. राजस्थान सरकार ने तर्क दिया कि इस क्षेत्र में पहले से ही आवासीय कॉलोनियां, सरकारी संस्थान, स्कूल-कॉलेज और थर्मल पावर प्लांट जैसे ढांचे विकसित हो चुके हैं, जो राजस्व भूमि पर बने हैं. अभयारण्य की वजह से इन क्षेत्रों में इको-सेंसिटिव जोन (ईएसजेड) घोषित होने पर पूरा कोटा शहर प्रभावित होता.
शहरीकरण की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए लिया गया है फैसला
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, यह फैसला शहरीकरण की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए लिया गया है. हालांकि, पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है कि इससे चंबल नदी के जलजीवों पर असर पड़ सकता है. क्षेत्र में पहले से ही कोटा शहर का सीवेज सीधे नदी में गिर रहा है, जो जलीय पारिस्थितिकी के लिए खतरा है. फिर भी, सरकार का कहना है कि संरक्षण के लिए अन्य उपाय किए जाएंगे और मुख्य अभयारण्य क्षेत्र अछूता रहेगा. किशोरपुरा, शिवपुरा और सकतपुरा जैसी कॉलोनियों में निवासियों ने इस फैसले का स्वागत किया है. लोगों की दशकों की मांग पूरी हुई है. कानूनी मान्यता मिलने के बाद बेहतर सुविधाओं में रह सकेंगे. यह डिनोटिफिकेशन कोटा के विकास को नई गति देगा. विभाग ने आश्वासन दिया है कि घड़ियाल और अन्य प्रजातियों की सुरक्षा के लिए निगरानी जारी रहेगी.



