लूणकरणसर वेटलैंड में 20 हजार से अधिक कुरजां का डेरा, मरुस्थल में सजी प्रवासी पक्षियों की अनूठी दुनिया!

बीकानेर. लूणकरणसर क्षेत्र इन दिनों प्रकृति के एक अद्भुत और दुर्लभ दृश्य का साक्षी बन रहा है. यहां स्थित वेटलैंड में 20 हजार से अधिक प्रवासी पक्षियों, स्थानीय भाषा में कुरजां ने अपना अस्थायी बसेरा बना लिया है. दूर-दूर तक फैले इस जलाशय में सुबह और शाम के समय कुरजां के विशाल झुंडों की सामूहिक उड़ान और कलरव पूरे क्षेत्र को जीवंत कर देता है. रेगिस्तान के बीच बसे इस जलस्रोत ने न केवल स्थानीय लोगों, बल्कि वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरण विशेषज्ञों का भी विशेष ध्यान आकर्षित किया है.
कुरजां, जिन्हें वैज्ञानिक रूप से डेमोइसेल क्रेन कहा जाता है, विश्व के अत्यंत ठंडे क्षेत्रों, मंगोलिया, कजाकिस्तान और साइबेरिया से हर वर्ष हजारों किलोमीटर की लंबी और कठिन यात्रा कर राजस्थान पहुंचते हैं. ये पक्षी अगस्त–सितंबर में अपने मूल आवास से उड़ान भरते हैं और अक्टूबर के अंत तक राजस्थान में प्रवेश कर जाते हैं, यहां वे मार्च माह तक प्रवास करते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, इन देशों में सर्दियों के दौरान तापमान माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जिससे भोजन की उपलब्धता और जीवनयापन अत्यंत कठिन हो जाता है. ऐसे में राजस्थान का अपेक्षाकृत गर्म, शांत और सुरक्षित वातावरण कुरजां के लिए जीवनदायी सिद्ध होता है.
बीकानेर क्षेत्र में कुरजां का आगमन कोई नई परंपरा नहीं
पिछले लगभग चार दशकों से ये प्रवासी पक्षी नियमित रूप से यहां आते रहे हैं, विशेष रूप से लूणकरणसर की खारे पानी की झीलें कुरजां के लिए अत्यंत अनुकूल मानी जाती हैं. वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, खारे जल में पनपने वाले सूक्ष्म जलीय जीव, शैवाल और विभिन्न प्रकार के कीट कुरजां के प्राकृतिक आहार का प्रमुख हिस्सा होते हैं. इसके साथ ही इस क्षेत्र में पाए जाने वाला सेलेनाइट अयस्क भी कुरजां को विशेष रूप से आकर्षित करता है, जिसे उनके पोषण के लिए सहायक माना जाता है.
खारे पानी की झीलों की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि यहां मानवीय गतिविधियां अपेक्षाकृत कम होती हैं. शांत वातावरण, खुले मैदान, उथला जल और पर्याप्त भोजन की उपलब्धता कुरजां को लंबे समय तक सुरक्षित प्रवास का अवसर प्रदान करती है. यही कारण है कि लूणकरणसर का यह वेटलैंड हर वर्ष हजारों कुरजां के लिए एक भरोसेमंद और सुरक्षित आश्रय स्थल बनता जा रहा है.
कुरजां की बढ़ती संख्या और क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता को देखते हुए वन विभाग और जिला प्रशासन द्वारा इस वेटलैंड को रामसर साइट का दर्जा दिलाने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं. रामसर कन्वेंशन के तहत अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलने से इस वेटलैंड के संरक्षण को मजबूती मिलेगी और इसके वैज्ञानिक अध्ययन, प्रभावी प्रबंधन और सतत विकास के नए अवसर भी खुलेंगे.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लूणकरणसर वेटलैंड को रामसर साइट का दर्जा मिलता है, तो यह न केवल प्रवासी पक्षियों के संरक्षण में अहम भूमिका निभाएगा, बल्कि पर्यावरण पर्यटन को भी बढ़ावा देगा. इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे और क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय पहचान और प्रतिष्ठा और अधिक मजबूत होगी.



