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Last Updated:December 29, 2025, 11:08 IST

Bikaner News Hindi: रेगिस्तानी जीवन में संसाधनों का उपयोग बेहद समझदारी से किया जाता था. राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में ऊंट की चमड़ी से बने बर्तन खाने-पीने की सामग्री को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल होते थे. ये बर्तन तापमान को संतुलित रखते और पानी को ठंडा बनाए रखते थे. पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा रेगिस्तान की अनूठी विरासत और लोगों की प्रकृति-अनुकूल जीवनशैली को दर्शाती है, जो आज भी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में याद की जाती है.

बीकानेर. रेगिस्तानी अंचलों में आधुनिक संसाधनों के अभाव के बावजूद पुराने समय में लोग अपने जीवन को सहज और सुरक्षित बनाने के लिए अनोखे उपाय अपनाते थे. उन्हीं परंपरागत उपायों में ऊंट की चमड़ी से बनाए जाने वाले बर्तनों का विशेष स्थान रहा है. मजबूत और टिकाऊ ऊंट की चमड़ी से तैयार इन बर्तनों का उपयोग पानी, दूध, घी, दही और अन्य खाद्य सामग्री को संग्रहित करने में किया जाता था. बीकानेर के राष्ट्रीय ऊंट अनुसंधान केंद्र में यह ऊंट की चमड़ी से बनी चीजें आज भी संग्रहित है.

विशेषज्ञों के अनुसार ऊंट की चमड़ी प्राकृतिक रूप से तापमान को संतुलित रखती थी, जिससे गर्मी के मौसम में भी इन बर्तनों में रखा तरल पदार्थ लंबे समय तक खराब नहीं होता था. यही कारण था कि ग्रामीण और रेगिस्तानी क्षेत्रों में यह बर्तन घर-घर में देखने को मिलते थे. खानाबदोश समुदायों के लिए ये बर्तन यात्रा के दौरान भी बेहद उपयोगी साबित होते थे.

यह कला धीरे-धीरे लुप्त होती जा रहीसमय के साथ प्लास्टिक और धातु के बर्तनों ने इन पारंपरिक साधनों की जगह ले ली, जिससे यह कला धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है. हालांकि आज भी कुछ इलाकों में बुजुर्ग इस परंपरा को याद करते हैं और इसे सांस्कृतिक धरोहर मानते हैं.

इतिहासकारों का मानना है कि यदि इन पारंपरिक तरीकों को संरक्षित किया जाए, तो यह न केवल हमारी संस्कृति को जीवित रखेगा बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी लाभकारी साबित हो सकता है.

ऊंट की चमड़ी से बनी चीजेंजानकारी के अनुसार ऊंट की चमड़ी से कई चीजें बनती थी. इनमें मशक है जिसमें पानी, दूध या छाछ रखने के लिए इस्तेमाल होने वाला सबसे प्रचलित चमड़े का पात्र। यात्रा और रेगिस्तानी इलाकों में खास तौर पर उपयोग में आता था.

छोटा चमड़े का बर्तनकुप्पा/कुप्पी में दूध, दही या घी रखने के लिए बनाया जाने वाला छोटा चमड़े का बर्तन होता है. छागल (छागलड़ी) में पानी संग्रह के लिए प्रयुक्त चमड़े का बड़ा पात्र, जिसे कंधे पर लटकाकर ले जाया जाता था. सुराही (चमड़े की) को विशेष आकार में तैयार किया गया चमड़े का बर्तन, जिसमें पानी ठंडा बना रहता था. थैली / बोरी में अनाज, सूखा खाद्य पदार्थ या घी रखने के लिए बनाई जाने वाली चमड़े की थैली होती है. मठका को ग्रामीण इलाकों में दही जमाने या तरल पदार्थ रखने के लिए उपयोग किया जाता था.

About the AuthorJagriti Dubey

With more than 6 years above of experience in Digital Media Journalism. Currently I am working as a Content Editor at News 18 in Rajasthan Team. Here, I am covering lifestyle, health, beauty, fashion, religion…और पढ़ें

Location :

Bikaner,Rajasthan

First Published :

December 29, 2025, 11:08 IST

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रेगिस्तान में ऊंट की चमड़ी के बर्तनों में सहेजा जाता था खाना-पानी

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