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कार्बाइड गन या पटाखे किससे आंखों को ज्यादा हुआ नुकसान? एम्स में आए 190 मरीजों की हालत कैसी? डॉक्टरों ने बताया carbide gun and fire crackers eye injury in aiims rp centre delhi

Last Updated:October 29, 2025, 17:40 IST

Carbide gun or fire crackers which is more harmful: एम्‍स आरपी सेंटर में द‍िवाली से अभी तक आए मरीजों में से 25 फीसदी की आंखों की रोशनी चली गई है. जबक‍ि बड़ी संख्‍या में मरीजों को लंबे समय तक इलाज की जरूरत पड़ेगी. इनमें 7 साल से 35 साल तक के युवा शाम‍िल हैं. डॉक्‍टरों का कहना है क‍ि अगली बार आंखों की चोटों के ये मामले न बढ़ें इसके लिए कुछ उपाय क‍िए जाने चा‍ह‍िए.

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कार्बाइड गन या पटाखे किससे आंखों को ज्यादा हुआ नुकसान? एम्स में आए 190....एम्‍स में कार्बाइड गन और पटाखों से चोट के 190 मरीज पहुंचे हैं.

Carbide gun and crackers injury in eyes: इस दिवाली पर कार्बाइड गन और पटाखों की वजह से सैकड़ों बच्चों की आंखों को भयंकर नुकसान पहुंचा है. केवल एम्स दिल्ली के आरपी सेंटर फॉर ऑप्थेल्मिक साइंसेज की इमरजेंसी में ही 190 से ज्यादा मरीज आए हैं. जिनमें से करीब 50 बच्चों और युवाओं की आंखों की रोशनी पूरी तरह चली गई है. जबकि बाकी सभी का इलाज किया जा रहा है.डॉक्टरों की मानें तो इस बार सोशल मीडिया पर देख-देख कर शौक-शौक में बनाई गई कार्बाइड गन ने बच्चों की आंखों को थर्मल, कैमिकल और मैकेनिकल चोट पहुंचाई है. ऐसे में आरपी सेंटर के डॉक्टरों ने सभी को इन सभी मरीजों की आंखों की हालत के बारे में बताते हुए भविष्य में इस तरह के केसों से बचने के लिए उपायों पर जोर दिया है.

आरपी सेंटर की चीफ प्रोफेसर डॉ. राधिका टंडन ने बताया कि दिवाली-दशहरा के आसपास आई इंजरी बढ जाती हैं. इस दौरान पारंपरिक गतिविधियों के चलते एक्सीडेंटली तीर कमान से चोट लगना, पटाखों से जलने की परेशानियां ज्यादा देखी जाती हैं. लेकिन इस बार इन दो चीजों के अलावा कार्बाइड गन जैसी कुछ नई चीजें भी सामने आई हैं जिनकी वजह से आंखों को भारी नुकसान पहुंचा है. हर साल के मुकाबले इस बार दिवाली से लेकर अभी तक एम्स आरपी सेंटर में पटाखों से जलने वाले करीब 20 फीसदी मरीज ज्यादा आए हैं. इनमें कार्बाइड गन से घायल होने वाले करीब 20 मरीज हैं.सिर्फ दिवाली के दिन 97 केस
रेटिना एक्सपर्ट और प्रोफेसर इंचार्ज इमरजेंसी डॉ. राजपाल ने आंकड़े देते हुए बताया, ‘पिछले 10 दिन में 190 से ज्यादा मरीज आए हैं जिनका एम्स आरपी सेंटर में इलाज किया गया है. पहले दिन हमारे पास 97 केस आए थे जो कुल मरीजों का करीब 51 फीसदी है. करीब 44 फीसदी मामले दिल्ली के थे, जबकि बाकी 56 फीसदी मरीज बाहरी राज्यों से हैं. बाहर से आने वाले सभी वे मरीज हैं जो स्थानीय स्तर पर इलाज की सुविधा न मिलने के कारण एम्स लाए गए.’

‘इनमें ज्यादातर मरीज बिना सावधानी के पटाखे चलाने वाले हैं. इनकी उम्र 7 साल से 35 साल के बीच है. इनमें पुरुषों की संख्या महिला मरीजों के मुकाबले 5 गुना ज्यादा है. इन सभी केसेज में 17 फीसदी मामलों में दोनों आंखों में गंभीर इंजरी हुई है. इनमें ओपन ग्लोब इंजरी है जिनमें सर्जरी की गई है. इन मरीजों की आंखों की इंटीग्रिटी खराब और विजन लॉस ज्यादा हुआ है. इस बार कैमिकल से जलने वाले मरीज भी ज्यादा आए हैं.’

इस बार नए डिवाइस से काफी हुआ नुकसान इस बार कार्बाइड गन जैसे डिवाइस से आंखों को काफी नुकसान हुआ है, ये वे डिवाइस हैं जो सोशल मीडिया पर देखकर खुद ही बच्चों ने घरों में बनाए हैं. देखा गया कि इन लोकल बंदूकों में कैमिकल और थर्मल दोनों तरह का रिएक्शन होता है और बड़ा विस्फोट होता है. इनसे कुछ मरीजों का कॉर्निया पिघल गया है जो कि काफी गंभीर विषय है. कार्बाइड गन के मामले एम्स में पटाखों के मुकाबले कम हैं लेकिन देश के बाकी सेंटर्स पर काफी ज्यादा आए हैं.

25 फीसदी की चली गई आंखों की रोशनी डॉ. राजपाल कहते हैं कि इन सभी मरीजों में से 25 फीसदी मरीजों की आंखों की रोशनी चली गई है. इन्हें मॉडरेट विजुअल लॉस हुआ है. आमतौर पर आंखों में कैमिकल इंजरी, बर्न इंजरी, मैकेनिकल इंजरी देखी गई हैं, इनमें मैकेनिकल इंजरी काफी खराब है जिसमें तत्काल कॉर्निया को रिपेयर करने की जरूरत पड़ी है. कुछ केसेज में पलकों में भी चोट लगी है.

दिवाली पर आई थ्री इन वन इंजरीवहीं प्रोफेसर नम्रता शर्मा ने कहा कि इतने केसों की आशंका नहीं थी. कार्बाइड गन को किसान खेतों में इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इस बार बिना किसी सुरक्षा के बच्चों ने इन्हें घर पर ही बना लिया. हमारे पास अभी तक केवल कैमिकल, थर्मल या मैकेनिकल इंजरी अलग-अलग रूप में आती थीं, लेकिन दिवाली पर तीनों कंपोनेंट के साथ वाली इंजरी आई हैं. मरीज पटाखों से जले भी हैं, इनमें कैमिकल भी था और स्पीड से आंख पर चोट देने वाली चीजें थीं. इसलिए कार्बाइड गन से आंखों में लगी ये चोट तीन गुना ज्यादा घातक हैं. इसलिए देखा जा रहा है कि कई मरीजों में यह रोशनी कभी वापस नहीं आएगी.

बचाव के लिए क्या किया जाना चाहिए?डॉ. राधिका टंडन ने कहा कि बाद में इलाज करने से बेहतर है कि इन इंजरी को रोकने की व्यवस्था की जाए. इसके लिए कुछ उपाय किए जाने चाहिए.. सबसे पहले तो लोगों को पटाखों और कार्बाइड गन आदि के खतरे के बारे में जानकारी होनी चाहिए.. पटाखों के निर्माण पर ही बैन लगा देना चाहिए.. अगर पटाखों पर रोक नहीं लग पा रही है तो जैसे एक्सीडेंट को लेकर सेफ्टी पॉलिसी है कि वाहन चलाते समय हेलमेट पहनना पड़ेगा, सीट बेल्ट लगानी होगी, ऐसी ही कोई यूनिवर्सल पॉलिसी पटाखों के इस्तेमाल को लेकर भी बनाई जानी चाहिए.. पेरेंट्स को, बच्चों और युवाओं को पता होना चाहिए कि एक बार अगर आंखों में गंभीर चोट लग जाए तो उसे पहले की तरह पूरी तरह ठीक करना डॉक्टरों के भी बस की बात नहीं है.. पटाखे चला रहे हैं तो सुरक्षा के तरीके अपनाएं, कोशिश करें कि पॉलीकार्बोनेट गॉगल्स पहनकर पटाखे चलाएं.. दिवाली पर जैसे पटाखे बिकते हैं ऐसे ही सेफ्टी गॉगल्स या फेस मास्क भी बिकने चाहिए. ताकि किसी भी प्रकार की इंजरी को रोका जा सके.. कुछ ऐसे उपाय किए जाएं कि हाई इंटेंसिटी बॉम्स को दूर से चलाया जा सके.

priya gautamSenior Correspondent

अमर उजाला एनसीआर में रिपोर्टिंग से करियर की शुरुआत करने वाली प्रिया गौतम ने हिंदुस्तान दिल्ली में संवाददाता का काम किया. इसके बाद Hindi..com में वरिष्ठ संवाददाता के तौर पर काम कर रही हैं. हेल्थ एंड लाइफस्…और पढ़ें

अमर उजाला एनसीआर में रिपोर्टिंग से करियर की शुरुआत करने वाली प्रिया गौतम ने हिंदुस्तान दिल्ली में संवाददाता का काम किया. इसके बाद Hindi..com में वरिष्ठ संवाददाता के तौर पर काम कर रही हैं. हेल्थ एंड लाइफस्… और पढ़ें

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First Published :

October 29, 2025, 17:40 IST

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