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Dharohar: राठौड़ वंश का गौरव जूनागढ़ किला, जहां जीवंत है बीकानेर का इतिहास, सुरक्षित हैं ऐतिहासिक प्रतीक चिन्ह

बीकानेर. मरुधरा की रियासतों में विशेष स्थान रखने वाले बीकानेर राज्य की स्थापना और उसकी गौरवशाली परंपरा आज भी जूनागढ़ किले की प्राचीरों में जीवंत रूप से विद्यमान है. मारवाड़ जोधपुर के शासक राव जोधा राठौड़ के ज्येष्ठ पुत्र राव बीका ने अपने लिए स्वतंत्र राज्य की स्थापना के संकल्प के साथ सन् 1485 ईस्वी में रातीघाटी क्षेत्र में किले की नींव रखी थी. इसी किले के आस-पास सन् 1488 ईस्वी में बीकानेर नगर बसाया गया, जिसने आगे चलकर एक सशक्त और समृद्ध रियासत का रूप लिया.

इन राठौड़ वंश के पूजनीय प्रतीक को देखने के लिए देश और विदेश से लाखों सैलानी आते है. यहां जूनागढ़ किले में राव जोधा की ढाल, बैरीसाल नगारा, हरबू जी सांखले की कटार, राव जोधा जी की तलवार, महाराजा गंगा सिंह जी की तलवार, दक्षिण वर्त शंख, सिर पेच, सोने की मोहर, महाराजा गंगा सिंह जी की ढाल है. इसके अलावा जम्भो जी की ओर से प्रदत्त ढोल भी रखा गया है.

राय बीका ट्रस्ट की संपत्ति है प्रतीक चिन्ह

इतिहासकारों के अनुसार, राव बीका ने जोधपुर राज्य में अपने पैतृक शासन अधिकार का परित्याग किया था. इसके एवज में अपने पिता राव जोधा की इच्छा के अनुसार, उनकी मृत्यु के पश्चात् उनकी माता नाता जस्मादे द्वारा ये पूजनीय प्रतीक चिन्ह राव बीका को प्रदान किए गए. इन्हीं प्रतीकों को बीकानेर की स्थापना और राठौड़ वंश की वैधता का प्रतीक माना जाता है. वर्तमान में ये सभी प्रतीक चिन्ह राय बीका ट्रस्ट की संपत्ति हैं. ट्रस्ट के संरक्षण में इन्हें जूनागढ़ किले के राय महल में सुरक्षित रखा गया है, जहां देश-विदेश से आने वाले पर्यटक और शोधार्थी इन्हें देख सकते हैं. ये धरोहरें न केवल बीकानेर के ऐतिहासिक अतीत की झलक प्रस्तुत करती हैं, बल्कि राठौड़ वंश की परंपरा, त्याग और सांस्कृतिक मूल्यों की भी साक्षी हैं.

प्रारंभ में ‘चिन्तामणी दुर्ग’ कहलाता था जूनागढ़ किला

जूनागढ़ किला और उसमें संरक्षित ये पूजनीय प्रतीक चिन्ह आज भी बीकानेर की पहचान का आधार बने हुए हैं. मरुस्थल की गोद में खड़ा यह दुर्ग आने वाली पीढ़ियों को साहस, दूरदृष्टि और गौरवशाली इतिहास की प्रेरणा देता है. बीकानेर राठौड़ वंश के छठे शासक महाराजा रायसिंह ने समय की सामरिक चुनौतियों को भांपते हुए सन् 1589 ईस्वी में एक ऐसे दुर्ग की नींव रखी, जो आज जूनागढ़ किले के नाम से विख्यात है. प्रारंभ में यह दुर्ग ‘चिन्तामणी दुर्ग’ कहलाता था. लगभग दस वर्षों के कठिन निर्माण कार्य के बाद यह भव्य किला सन् 1599 ईस्वी में बनकर तैयार हुआ.

जूनागढ़ किला का देशभर में विशिष्ट स्थान

अपनी मजबूत संरचना, उत्कृष्ट शिल्पकला और अद्भुत भित्ति-चित्रों के कारण जूनागढ़ किला आज देशभर के किलों में एक विशिष्ट पहचान रखता है. इतिहास प्रेमियों के लिए जूनागढ़ किला केवल एक दुर्ग नहीं, बल्कि राठौड़ शासकों की गौरवगाथा का जीवंत दस्तावेज है. किले में स्थित राय महल के एक विशेष कक्ष में मारवाड़ राज्य के राठौड़ वंश से जुड़े अत्यंत पूजनीय प्रतीक चिन्हों को संरक्षित कर प्रदर्शित किया गया है. ये वे ऐतिहासिक धरोहरें हैं, जिन्हें बीकानेर राज्य के संस्थापक राव बीका अपने साथ जोधपुर से बीकानेर लाए थे.

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