Dhaulpur News : ऋषि-मुनियों की तपोस्थली से चंबल के बीहड़ तक, यहां है विंध्याचल पर्वत का अंतिम छोर!

धौलपुर. राजस्थान का धौलपुर जिला अपने गौरवशाली इतिहास और बेजोड़ स्थापत्य कला के लिए जाना जाता है. लेकिन आज धौलपुर की चर्चा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यहां से गुजरने वाली विंध्याचल पर्वत श्रृंखला जिले के इतिहास, भूगोल और पौराणिक कथाओं में विशेष स्थान रखती है. इन्हीं पर्वत श्रृंखलाओं के बीच से धौलपुर में बहने वाली चंबल नदी निकलती है, जो आगे चलकर बीहड़ों का निर्माण करते हुए यमुना नदी में विलीन हो जाती है. चंबल और विंध्याचल का यह प्राकृतिक संगम धौलपुर की पहचान को और अधिक विशिष्ट बनाता है.
भारत के दक्षिण और मध्य भाग में विंध्याचल पर्वत श्रृंखला का विशेष महत्व माना जाता है. यह पर्वत श्रृंखला गुजरात से शुरू होकर मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश होते हुए बिहार तक फैली हुई है. इसी विंध्याचल पर्वत श्रृंखला से देश की कई प्रमुख नदियों का उद्गम होता है. इस पर्वतमाला का अंतिम छोर राजस्थान के धौलपुर जिले में स्थित है, जो इसे भौगोलिक दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण बनाता है.
लोंग श्री पहाड़ और ऋषि-मुनियों की तपोस्थली
धौलपुर जिले में स्थित विंध्याचल पर्वत श्रृंखला का लोंग श्री पहाड़ अपने आप में एक विशिष्ट पौराणिक इतिहास समेटे हुए है. यह पहाड़ी महर्षि लोंग श्री महाराज की तपोस्थली मानी जाती है. कहा जाता है कि प्राचीन काल में ऋषि-मुनि यहां गुफाएं बनाकर तपस्या किया करते थे. आज भी इन पहाड़ियों की कंदराओं में उस तपस्वी जीवन की झलक देखने को मिलती है, जो धौलपुर की आध्यात्मिक विरासत को दर्शाती है.
प्राकृतिक वनस्पति और पर्यावरणीय महत्वअरविंद शर्मा बताते हैं कि धौलपुर की विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं में अनेक प्रकार के प्राकृतिक वृक्ष पाए जाते हैं. इनमें धोक का वृक्ष विशेष स्थान रखता है. मान्यता है कि पसीने की एक बूंद गिरने मात्र से यह वृक्ष हरा-भरा हो जाता है. ये वृक्ष विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की सुषमा और प्राकृतिक सौंदर्य को बढ़ाते हैं. जनापाव पहाड़ी से चंबल नदी का उद्गम होता है और इन्हीं पर्वत श्रृंखलाओं के बीच धौलपुर में चंबल का प्रवाह होता है. इसी कारण यह पर्वत श्रृंखला पर्यावरण की दृष्टि से धौलपुर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है और जिले की बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा है.
पौराणिक और धार्मिक दृष्टि से विंध्याचल का महत्वधौलपुर की विंध्याचल पर्वत श्रृंखला का धार्मिक और पौराणिक महत्व भी कम नहीं है. इन्हीं पहाड़ियों के बीच तीर्थों का भांजा कहे जाने वाला मचकुंड धाम स्थित है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहीं भगवान श्रीकृष्ण की नीति का उदय हुआ था. इसी स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण ने कालयावन नामक राक्षस का वध महाराज मचकुंड से कराया था. इसके अलावा इन पहाड़ियों से जुड़ी एक मान्यता यह भी है कि सिखों के छठवें गुरु श्री हरगोविंद सिंह जी ने यहां तलवार के एक वार से शेर का शिकार किया था.
विंध्याचल पर्वत की भौगोलिक संरचना और विस्तार
विंध्याचल पर्वत श्रृंखला गुजरात से शुरू होकर मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश होते हुए बिहार तक जाती है. राजस्थान में विंध्याचल पर्वत कोटा, बूंदी और झालावाड़ में मुकुंदरा पहाड़ियों के रूप में, जबकि धौलपुर में लोंग श्री पहाड़ और मोनी सिद्ध की पहाड़ के रूप में पहचाना जाता है. धौलपुर क्षेत्र में विंध्याचल पर्वत की ऊंचाई लगभग 300 मीटर मानी जाती है. पूरे भारतवर्ष में विंध्याचल पर्वत की कुल लंबाई करीब 1200 किलोमीटर से अधिक मानी जाती है, जबकि इसकी औसत ऊंचाई 300 से 700 मीटर के बीच रहती है.
प्राकृतिक विरासत को सहेजने की जिम्मेदारीअरविंद शर्मा कहते हैं कि जिस तरह आज अरावली पर्वत श्रृंखला अपने अस्तित्व और इतिहास को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है, उसी तरह की स्थिति धौलपुर की विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं के सामने कभी न आए, यह हम सभी की जिम्मेदारी है. धौलपुरवासियों का दायित्व बनता है कि वे अपनी इस अनमोल प्राकृतिक संपदा को अक्षुण्ण बनाए रखें. क्योंकि यही प्राकृतिक विरासत धौलपुर की पहचान है, और पहचान को कभी समाप्त नहीं किया जाता है.



