Rajasthan

धौलपुर महाराज राना भगवंत सिंह स्थापत्य कला

Last Updated:January 02, 2026, 13:16 IST

Dholpur: धौलपुर महाराज राना भगवंत सिंह का शासन काल स्थापत्य कला का स्वर्ण युग माना जाता है. उन्होंने मचकुंड धाम के मंदिरों, अधूरा ताजमहल (गजरा मकबरा), और चोपड़ा मंदिर जैसी ऐतिहासिक इमारतों का निर्माण कराया, जो धौलपुर के लाल-सफेद पत्थरों की खूबसूरती को प्रदर्शित करती हैं.

ख़बरें फटाफट

धौलपुर: राजस्थान का धौलपुर जिला वर्ष 1947 से पूर्व एक ऐसी रियासत के रूप में विख्यात था, जिसकी पहचान अपनी विशिष्ट वास्तुकला और पत्थरों के जादुई सृजन से थी. इस रियासत को एक नई ऊँचाई पर ले जाने में प्रथम जाट नरेश महाराज राना कीरत सिंह के पश्चात महाराज राना भगवंत सिंह का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है. उनका शासन काल धौलपुर के लिए न केवल राजनीतिक स्थिरता का युग था, बल्कि सौंदर्यीकरण और स्थापत्य कला का वह ‘स्वर्ण काल’ था, जिसने धौलपुर को एक अलग सांस्कृतिक पहचान दिलाई.

इतिहासकार अरविंद शर्मा बताते हैं कि तीर्थों के भांजे कहे जाने वाले विश्व प्रसिद्ध मचकुंड धाम की वर्तमान भव्यता का श्रेय काफी हद तक महाराज राना भगवंत सिंह को ही जाता है. उनके शासन काल में मचकुंड सरोवर के किनारे धौलपुर के प्रसिद्ध लाल और सफेद बलुआ पत्थरों से कई मंदिरों का निर्माण कराया गया. इनमें ‘लाडली जगमोहन जी मंदिर’ और ‘मदन मोहन जी मंदिर’ प्रमुख हैं. आषाढ़ शुक्ल चतुर्थी को निर्मित लाडली जगमोहन जी मंदिर की उत्कृष्ट नक्काशी, स्तंभ और मेहराब राजस्थानी शिल्पकला की बारीकी को दर्शाते हैं. इसी प्रकार मदन मोहन जी मंदिर का निर्माण भी उनकी कलाप्रियता का एक अनुपम उदाहरण है.

अधूरा ताजमहल: प्रेम की एक कलात्मक निशानीमहाराज राना भगवंत सिंह के दौर की सबसे चर्चित इमारत ‘गजरा का मकबरा’ है, जिसे इतिहास में ‘अधूरा ताजमहल’ के नाम से जाना जाता है. उन्होंने अपनी प्रियसी गजरा की याद में लाल और सफेद पत्थरों से इसका निर्माण शुरू करवाया था. वास्तुकला के जानकारों का कहना है कि यदि यह मकबरा पूर्ण हो जाता, तो यह सुंदरता के मामले में आगरा के संगमरमर के ताजमहल को कड़ी चुनौती पेश करता. इसके अलावा, सिख धर्म के छठवें गुरु हरगोविंद सिंह जी की स्मृति में निर्मित ‘शेर साहिब गुरुद्वारा’ और भव्य ‘जगन्नाथ मंदिर’ भी उनके युग की अनमोल देन हैं.

चोपड़ा मंदिर और बाड़ी की विरासतधौलपुर का चोपड़ा मंदिर स्थापत्य कला के अपने चरम पर दिखाई देता है. मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई आकृतियाँ इतनी सजीव हैं कि मानो किसी ने पेन से कागज पर चित्र बना दिए हों. महाराज राना भगवंत सिंह की कला दृष्टि केवल धौलपुर शहर तक सीमित नहीं थी, बल्कि बाड़ी उपखंड में स्थित ‘बाड़ी का किला’ और ‘बारहदरी’ भी उनके स्वर्ण युग की कलात्मक निशानी हैं. मुगलों के समय में धौलपुर के पत्थरों के उपयोग की संभावना तो दिखी थी, लेकिन उसे पूर्ण उत्कृष्टता प्रदान करने का कार्य महाराज भगवंत सिंह ने ही किया.

1857 की क्रांति के बाद उत्पन्न हुई अव्यवस्थाओं के कारण निर्माण की यह गति कुछ धीमी जरूर हुई, लेकिन उनके द्वारा निर्मित इमारतें आज भी धौलपुर के गौरवशाली अतीत को जीवंत किए हुए हैं. यही कारण है कि उन्हें धौलपुर रियासत के स्थापत्य कला का जनक कहा जाता है.

About the Authorvicky Rathore

Vicky Rathore is a multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience in digital media, social media management, video production, editing, content writing, and graphic, A MAJMC gra…और पढ़ें

Location :

Dhaulpur,Dhaulpur,Rajasthan

First Published :

January 02, 2026, 12:59 IST

homerajasthan

Dharohar: ‘अधूरे ताजमहल’ से मचकुंड तक: महाराज राना भगवंत सिंह की अमर विरासत

Source link

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Uh oh. Looks like you're using an ad blocker.

We charge advertisers instead of our audience. Please whitelist our site to show your support for Nirala Samaj