Rajasthan

अलवर में युवाओं की गौ सेवा की मिसाल, दिव्यांग गोशाला बना घायल और दृष्टिहीन गायों के लिए जीवन का आश्रय!

अलवर. जिले में अक्सर देखने को मिलता है कि लोग गौवंश को खुले में छोड़ देते हैं, जिसके कारण सड़क हादसों में गायें घायल हो जाती हैं या असमय मौत का शिकार हो जाती हैं. ऐसे हालात में अलवर के कुछ संवेदनशील और जागरूक युवाओं ने आगे आकर गौ-सेवा की एक अनूठी मिसाल पेश की है. ये युवा न केवल घायल गौवंश का इलाज कराते हैं, बल्कि उनकी देखभाल कर समाज को जागरूक करने का कार्य भी कर रहे हैं.

अलवर शहर के समीप गुर्जरवास क्षेत्र में संचालित दिव्यांग गोशाला केवल एक आश्रय स्थल नहीं है, बल्कि यह उन गायों के लिए जीवन का सहारा बनी हुई है, जो सड़क हादसों, गंभीर बीमारियों, एसिड अटैक या असामाजिक तत्वों की हिंसा का शिकार हुई हैं. इस गोशाला की शुरुआत 21 अप्रैल 2021 को की गई थी. वर्तमान में यहां लगभग 96 गंभीर रूप से घायल, दृष्टिहीन और दिव्यांग गायें सुरक्षित जीवन व्यतीत कर रही हैं.

करीब 9 बीघा भूमि मिली दान में

इस गोशाला के लिए समाजसेवी रामपाल यादव ने अपनी माताजी के नाम पर करीब 9 बीघा भूमि दान में दी है. इस भूमि में से लगभग डेढ़ बीघा क्षेत्र में गायों के लिए आश्रय स्थल का निर्माण किया गया है, जबकि शेष भूमि पर चारागृह विकसित किया गया है, ताकि गौवंश को हरा चारा उपलब्ध कराया जा सके. दिव्यांग गोशाला का संचालन गौ जीव परमार्थ सेवा संस्थान द्वारा किया जा रहा है, जिसमें अलवर के 40 से अधिक युवा अपनी दिनचर्या से समय निकालकर नि:स्वार्थ भाव से गायों की सेवा में लगे हुए हैं. गोशाला की देखरेख करने वाले गोसेवक महेंद्र ने बताया कि उन्होंने करीब 9 वर्षों तक पशु चिकित्सालय में कार्य किया है.

वहां पशुओं के इलाज का अनुभव प्राप्त करने के बाद उन्होंने गुर्जरवास स्थित इस दिव्यांग गोशाला में सेवा करने का निर्णय लिया. उनका सपना है कि भविष्य में दिव्यांग गौवंश के लिए एक हाईटेक पशु अस्पताल की स्थापना की जाए. महेंद्र ने बताया कि वर्तमान में गोशाला में मौजूद 96 गोवंशों में से 28 दृष्टिहीन हैं और 60 से अधिक शारीरिक रूप से विकलांग हैं. जैसे ही किसी घायल या बीमार गाय की सूचना मिलती है, युवा टीम तुरंत मौके पर पहुंचकर गाय को गोशाला लेकर आती है, जहां उसका नि:शुल्क इलाज किया जाता है. इलाज के बाद यदि गाय पूरी तरह स्वस्थ हो जाती है, तो उसे कांजी हाउस में छोड़ दिया जाता है, जबकि स्थायी रूप से विकलांग या असहाय गायों को गोशाला में ही रखकर उनकी सेवा की जाती है.

सरकार की ओर से किसी भी प्रकार की सहायता प्राप्त नहीं

गोशाला संचालन को लेकर गोसेवकों ने बताया कि अब तक सरकार की ओर से किसी भी प्रकार की सहायता प्राप्त नहीं हुई है. चारा, दवाइयां और अन्य व्यवस्थाएं पूरी तरह से समाज के सहयोग और दान पर निर्भर हैं. यहां रहने वाली दिव्यांग और दृष्टिहीन गायों की देखभाल में काफी मेहनत लगती है, लेकिन गोसेवक हर गाय को परिवार के सदस्य की तरह संभालते हैं. कई गायें ऐसी हैं, जो एसिड अटैक या गंभीर हादसों में अपने पैर तक खो चुकी हैं, फिर भी उन्हें यहां सम्मान, सुरक्षा और संवेदनशीलता के साथ जीवन जीने का अवसर दिया जा रहा है.

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