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भाई बहन को देख मोरल पुलिसिंग,पार्टी सुनी तो छापा, सोशल मीडिया का दौर है दरोगा जी ! अब डंडा ठीक नहीं, दिमाग रखिए ठंडा

Last Updated:December 16, 2025, 15:27 IST

बेंगलुरु में पुलिस आने की खबर सुन कर पाइप के सहारे भाग रही एक लड़की की गिर कर मौत हो गई. एक साथ जा रहे भाई-बहन को रोक कर महिला इंस्पेक्टर ने पूछ ताछ शुरू कर दी. बिना हेलमेट का बाइक सवार लड़का पुलिस की पकड़ में आने से बचने के लिए गिर कर जख्मी हो गया. ये वीडियो भी अक्सर सोशल मीडिया पर तैरती मिल जाती हैं. ये सब देख कर लगता है कि पुलिस के बारे में न तो लोगों का नजरिया बदला है और न ही पुलिस ने उसे बदलने की कोशिश ही की है. इसलिए जरूरी ये है कि खाकीवर्दी वाले अपनी इमेज बदलें. खासकर इस दौर में जब ज्यादातर सिपाही ग्रैजुएट और पोस्टग्रैजुएट हैं.भाई-बहन दिखे तो मोरल पुलिसिंग, पार्टी सुनी तो छापा, दरोगा जी! तरीका बदलना होगापूरे देश के पुलिस महकमे को अपने काम काज को रिव्यू करने की जरुरत है. (एआई फोटो)

खाकी वाले इस दौर के लिए पहले से भी ज्यादा जरूरी है. लिहाजा उनके विरोध में मैं नहीं लिखना चाहता. बस मशविरा देना चाहता हूं. हर आदमी जल्दी में है. हर आदमी जिंदगी का हर लुत्फ लेना चाहता है. उम्र जो भी हो. कछ भी छोड़ना नहीं चाहता. ऐसे में आपकी जरुरत और जिम्मेदारी ज्यादा ही बढ़ जाती है. लेकिन कहीं न कहीं कोई चीज छूट रही है. आपके काम करने के तरीके में कुछ गड़बड़ हो रही है. इसका नतीजा बहुत दूर तक जा रहा है. बेंगलुरू में एक युवती पार्टी में थी. पुलिस आने का हांका सुना और ड्रेनपाइप से उतरने लगी. गिर कर उसकी मौत हो गई. इसमें आपकी गलती नहीं है. लेकिन किसी की बेटी इस दुनिया से चली गई.

क्राइम क्या है, सजा क्या हो सकती है ये विचार ज्यादा जरूरीमैं ये आपसे जवाब तलब करने के लिए भी नहीं लिख रहा हूं. हो सकता है कि उस लड़की ने कानून की किसी धारा को तोड़ा हो. लेकिन उसकी सजा इतनी बड़ी तो नहीं हो सकती. जिंदगी अनमोल है. जिंदगी खत्म करने की सजा आप भी जानते हैं किसी रेयर ऑफ रेयरेस्ट क्राइम में ही हो सकती है. जाहिर है उसका कुसूर जो भी हो,इस दायरे में आने वाला तो नहीं ही होगा. बताया जा रहा है कि वो अपने दोस्तों के साथ किसी जगह पार्टी करने गई थी. छह सात लड़के थे. लड़की के घर वालों ने ही शिकायत की थी. इस पर पुलिस दस्ता पहुंच गया. कहीं ये भी कहा जा रहा है कि पुलिस के पहुंचने तक लड़की वहीं थी. फिर वो ड्रेन पाइप के जरिए चार मंजिला भवन से उतर कर भागने में लग गई. वहीं से गिर कर उसकी मौत हो गई. आप लोगों से बातचीत करने का विचार इस हादसे के बाद आने की एक वजह है. अक्सर सड़कों पर दिख जाता है कि पुलिस का एक दस्ता बगैर हेलमेट वालों को रोकता है. ज्यादातर लोग तो रुक जाते हैं. लेकिन पापा की मोटर साइकिल और कार लेकर निकले किशोर और नौजवान कई बार भागने की कोशिश करते हैं. पुलिस या पिर ट्रैफिक पुलिस के लोग उसे पकड़ने की कोशिश करते हैं. देखा गया है कि इस आपा धापी में मोटरसाइकिल सवार गिर जाते हैं.

कुछ वक्त पहले एक बहुत ही सज्जन पत्रकार का बेटा गाजियाबाद में अपने पिता की गाड़ी लेकर निकल पड़ा. ये कानून का उल्लंघन है. इसमें मामला दर्ज होना ही चाहिए. जानने वाले बताते हैं कि पत्रकार का बेटा चंचल है लेकिन बदमाश नहीं फिर भी कानून तोड़ने की सजा पुलिस वालों ने उस बच्चे को मौके पर ही सजा दे डाली. मामला सीएम तक पहुंचा था. बदमगजी हुई. लेकिन बेवजह किसी के बच्चे को लंबा भुगतना पड़ा.

लड़का-लड़की दिखे तो मोरल पुलिसिंग ? ठीक है क्याअभी बनारस के पास मऊ जिले का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा था. इसमें भाई – बहन कहीं जा रहे थे. महिला दरोगा जी को कुछ शक हुआ तो उन्होंने धमकाना धकियाना शुरु कर दिया. ये बात हजम ही नहीं हो पा रही है कि वे भाई बहन न भी होते तो क्या गलत था. कोई शरई कानून तो देश में लागू नहीं है, जहां गैरमरहम के साथ निकलना जुर्म हो जाए.

काम का दबाव है फिर भी सोच बदलेइसमें कतई शक नहीं है कि पुलिस महकमा दूसरे सरकारी विभागों से ज्यादा काम करता है. उसके लिए कोई शिफ्ट नहीं होती. जब कोई सूचना शिकायत आई तो बूट या कई बार बिना बूट के भी निकलना ही होता है. यहां तक कि कोई पुलिस वाला ये तक नहीं कह सकता कि उसके पास जाने का साधन नहीं है. मौके पर पहुंचना ही है. जैसे भी हो. फिर भी ये ध्यान रखना है कि जैसे सारे वर्दी वाले ये नहीं समझ पाएं हैं कि वे पार्टी (पक्षकार हैं), जज नहीं. उसी तरह लोगों के दिमाग में ये बात नहीं घुस पाई है कि आप हर अपराध के लिए जेल में नहीं ठूंस देंगे. वे भागते हैं. बचते हैं. तो इसका खयाल रखना होगा. खौफ खत्म करना होगा. पुलिस के पहुंचने से नागरिक को सेफ महसूस करना चाहिए. न कि ये लगे कि कोई संकट आ गया है.

डिजिटल दौर में डंडे का इस्तेमाल कितना सही?अब इस सोच को भी बदलने की जरुरत है कि जो जितना नीचले रैंक का होगा उसका डंडा उतना ही बड़ा होगा. ये बात अब पुरानी हो गई. अब तो सिपाही भी पोस्टग्रैजुएट हो रहे हैं. उन्हें भी उसी तरह से कंप्यूटर और मोबाइल की समझ है जैसे समाज के दूसरे लोगों की. लिहाजा अब वे भी बदले दौर को समझ रहे हैं. उन्हें थोड़ा और समझाने की जरूरत है.

About the Authorराजकुमार पांडेय

करीब ढाई दशक से सक्रिय पत्रकारिता. नेटवर्क18 में आने से पहले राजकुमार पांडेय सहारा टीवी नेटवर्क से जुड़े रहे. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद वहीं हिंदी दैनिक आज और जनमोर्चा में रिपोर्टिंग की. दिल…और पढ़ें

First Published :

December 16, 2025, 15:27 IST

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भाई-बहन दिखे तो मोरल पुलिसिंग, पार्टी सुनी तो छापा, दरोगा जी! तरीका बदलना होगा

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