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कोटड़ा-देवला जंगलों में बांस कटाई से आदिवासियों को रोजगार

Last Updated:December 17, 2025, 16:40 IST

बांस कटाई से न केवल आदिवासियों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है, बल्कि वन विभाग को भी बड़ा लाभ मिल रहा है.जानकारी के अनुसार, इस व्यवस्थित व्यवस्था से वन विभाग को हर साल करीब 3.50 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त होता है. यह मॉडल दिखाता है कि यदि वन संसाधनों का सही और संतुलित उपयोग किया जाए, तो जंगल भी सुरक्षित रह सकते हैं और स्थानीय लोगों की आजीविका भी

उदयपुर. जिले के कोटड़ा-देवला क्षेत्र के सघन जंगलों में नदी किनारे हर साल बसने वाला छह माह का अनोखा गांव आदिवासी समुदाय की आजीविका का बड़ा सहारा बन गया है. अक्टूबर से मार्च तक यहां 50 से अधिक कथौड़ी परिवार अस्थायी रूप से निवास करते हैं और बांस कटाई के जरिए अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं. करीब 40 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज आदिवासियों की आय का भरोसेमंद जरिया बन चुकी है.

इन जंगलों में रहने वाले कथौड़ी परिवार पीढ़ियों से बांस कटाई का कार्य कर रहे हैं, यह काम उनके पारंपरिक ज्ञान और अनुभव पर आधारित है, जिसे अब वन विभाग की निगरानी और निर्धारित नियमों के तहत किया जाता है. छह माह तक चलने वाले इस कार्य से आदिवासी परिवारों को रोजगार मिलता है, जिससे उन्हें पलायन नहीं करना पड़ता और वे अपने परिवार का भरण-पोषण सम्मानजनक तरीके से कर पाते हैं.

बांस कटाई से आदिवासियों की आर्थिक स्थिति मजबूत 

बांस कटाई से न केवल आदिवासियों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है, बल्कि वन विभाग को भी बड़ा लाभ मिल रहा है, जानकारी के अनुसार, इस व्यवस्थित व्यवस्था से वन विभाग को हर साल लगभग 3.50 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त होता है. यह मॉडल दिखाता है कि यदि वन संसाधनों का सही और संतुलित उपयोग किया जाए, तो जंगल सुरक्षित रह सकते हैं और स्थानीय लोगों की आजीविका भी चल सकती है. उदयपुर जिले के इन जंगलों में मुख्य रूप से डेंड्रोकैलेमस स्ट्रिक्टस प्रजाति के बांस पाए जाते हैं, यह बांस अपनी मजबूती और लंबाई के लिए जाना जाता है, जिसकी ऊंचाई 35 से 40 फीट तक होती है. इन बांसों की मांग निर्माण कार्य, कृषि उपकरण, फर्नीचर और घरेलू उपयोग में लगातार बनी रहती है. इसी मांग के कारण बांस कटाई आदिवासियों के लिए स्थायी आय का साधन बन गई है.

चार भागों में बांट रखा वन विभाग ने बांस के जंगलों को 

जिस हिस्से में एक साल कटाई होती है, वहां अगले चार साल तक दोबारा कटाई नहीं की जाती. इस चक्र से बांस को फिर से उगने का पूरा अवसर मिलता है और जंगलों का संतुलन बना रहता है. इससे आदिवासियों को लंबे समय तक रोजगार मिलने की संभावना भी बनी रहती है. छह माह तक बसने वाला यह गांव आदिवासी जीवनशैली, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण का बेहतरीन उदाहरण है. बांस कटाई का मौसम समाप्त होने पर कथौड़ी परिवार अपने स्थायी गांवों में लौट जाते हैं, लेकिन यह छह माह का प्रवास उनकी सालभर की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाता है. यह व्यवस्था आज उदयपुर में आदिवासियों की आय बढ़ाने और आत्मनिर्भरता की सफल कहानी बन चुकी है.

About the AuthorMonali Paul

Hello I am Monali, born and brought up in Jaipur. Working in media industry from last 9 years as an News presenter cum news editor. Came so far worked with media houses like First India News, Etv Bharat and NEW…और पढ़ें

Location :

Udaipur,Rajasthan

First Published :

December 17, 2025, 16:40 IST

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उदयपुर के कोटड़ा-देवला जंगलों में बांस कटाई से आदिवासियों को रोजगार

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