Rajasthan

किन्नू की फसल में फल झड़ने की समस्या और समाधान के लिए एक्सपर्ट टिप्स.

Last Updated:November 19, 2025, 13:52 IST

एग्रीकल्चर न्यूज: किन्नू की फसल किसानों के लिए लाभकारी तो है, लेकिन फल झड़ने की समस्या अक्सर नुकसान पहुंचाती है. इस गाइड में जानें एक्सपर्ट टिप्स — सही सिंचाई, कीट और रोग नियंत्रण, पोषण प्रबंधन और मौसम से बचाव — ताकि आपका किन्नू बाग स्वस्थ रहे और फलों की पैदावार बढ़े.Agriculture News

किन्नू की फसल किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित होती है, इससे किसानों को हर सीजन में लाखों का मुनाफा होता है. लेकिन किन्नू के बागानों में फल झड़ने की समस्या अधिक देखने को मिलती है, जिसके कारण फल जल्दी खराब होने लगते हैं. इसका मुख्य कारण पौधों पर लगने वाले फफूंद, कीट तथा पौधों की कमजोर पोषण व्यवस्था है. एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ के अनुसार, बाग की समय-समय पर सफाई करना, गिरी हुई पत्तियों और फलों को हटाना उचित दूरी पर पौधों की छंटाई करना इस समस्या से छुटकारा पाने में मदद करता है. इसके अलावा रोगों पर नियंत्रण रखना भी अत्यंत आवश्यक है.

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एग्रीकल्चर एक्सपर्ट के अनुसार, किन्नू के बागों में फंगल रोगों जैसे एन्थ्रैक्नोज़ और गमी रोग के नियंत्रण के लिए कार्बेन्डाजिम 50 WP (बाविस्टिन) 1 ग्राम प्रति लीटर पानी या प्रोपीनेब 70 WP (ऐन्ट्राकॉल) 2 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव बहुत प्रभावी है. ये दवाएं फल की सतह पर सुरक्षा कवच प्रदान करती हैं और फफूंद के प्रकोप को बढ़ने से रोकती हैं, जिससे फल झड़ना कम होता है. इसके अलावा, जिब्रेलिक एसिड (GA₃) 20 मिलीग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से किन्नू के फूल और छोटे फल मजबूत बनते हैं.

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यह हार्मोन फल के विकास को बढ़ाता है, डंठल को मजबूत करता है और पौधे की शारीरिक क्रियाओं को सक्रिय करके फल झड़ने की समस्या को कम करने में वैज्ञानिक रूप से प्रभावी पाया गया है. कई बार किन्नू में फल गिरने का प्रमुख कारण सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे जिंक, आयरन, बोरॉन और मैग्नीशियम की कमी होता है. पत्तियों पर स्प्रे के रूप में 0.2% बोरॉन या 1% मैग्नीशियम सल्फेट का प्रयोग, तथा जिंक सल्फेट 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से फल की गुणवत्ता और पकड़ दोनों में सुधार आता है.

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एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ के अनुसार, अधिक या कम सिंचाई दोनों ही किन्नू में फल गिरने की समस्या को बढ़ा सकते हैं. इसलिए पौधों के आसपास हमेशा समान नमी बनाए रखना चाहिए और भारी सिंचाई से बचना चाहिए. बूंद-बूंद सिंचाई का उपयोग करने से पौधों को जरूरत के अनुसार पानी मिलता है, जिससे पौधे पर तनाव कम होता है और फल गिरने की संभावना घट जाती है. सिंचाई की प्रक्रिया का खेती और उत्पादन पर भी प्रभाव पड़ता है, इसलिए किसानों को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए.

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इसके अलावा, सिट्रस लीफ माइनर, व्हाइटफ्लाई, एफिड्स जैसे कीट भी पौधे को कमजोर कर फल गिरने का कारण बनते हैं. ये कीट किन्नू के पौधे पर लगे फलों को भी जल्दी खराब कर देते हैं और समय से पहले जमीन पर गिरा देते हैं, जिससे किसानों को नुकसान होता है. ऐसे में इन कीटों के समय रहते नियंत्रण के लिए कीटनाशक दवाओं जैसे इमिडाक्लोप्रिड, थायामेथोक्साम या स्पिनोसैड का हल्का छिड़काव किया जा सकता है. कीट नियंत्रण होने पर पौधों की बढ़वार सामान्य रहती है और फल सुरक्षित रहते हैं.

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किन्नू की खाती में मौसम की अनुकूलता भी बहुत महत्वपूर्ण है. तेज गर्मी, सूखे की स्थिति, तेज हवा और अचानक तापमान गिरावट जैसी परिस्थितियां भी फल झड़ने का प्रमुख कारण बनती हैं. ऐसी स्थिति में किसान मल्चिंग का उपयोग करें और पौधों को गर्मी से बचाने के लिए ग्रीन नेट का प्रयोग करें. इसके अलावा, पौधों के आसपास कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ाने से पौधे तनाव से उबरते हैं. इससे पौधे में ऊर्जा का संतुलन सुधरता है और फल लंबे समय तक टिके रहते हैं.

First Published :

November 19, 2025, 13:52 IST

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