चाय की टपरी पर पिता का बटाया हाथ, 700 रुपए में की नौकरी, साथ में जारी रखी पढ़ाई, अब डायरेक्टर पर हुआ चयन

Agency: Rajasthan
Last Updated:February 10, 2025, 15:48 IST
कुमार अजय 11वीं की पढ़ाई के बाद काम की तलाश में जयपुर चले गए, जहां उन्हें 700 रुपए महीना पगार में मेडिकल स्टोर पर जॉब मिली लेकिन कुछ महीनों बाद ये लगने लगा ये नाकाफी है. वह नौकरी के साथ पढ़ाई करते रहे इसका परिणा…और पढ़ेंX

कुमार अजय
हाइलाइट्स
कुमार अजय ने 700 रु. पगार से करियर शुरू किया.आज कुमार अजय जयपुर में उप निदेशक पद पर हैं.कुमार अजय साहित्यकार भी हैं, कई पुस्तकें प्रकाशित.
चूरू. जीवन में कठिन संघर्ष से ही सफलता का शंखनाद किया जा सकता है. जी हां, कुछ ऐसी ही है गांव घांघू के कुमार अजय की सफलता की कहानी. कुमार अजय के संघर्ष की कहानी भले ही फिल्मी लगे लेकिन उनका संघर्ष आज उनकी सफलता की कहानी खुद बयां करता है. एक चाय की टपरी से पियोन और आज उप निदेशक के पद पर कार्यरत कुमार अजय आज उन युवाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं जो अपनी असफलताओं से हताश और निराश होकर प्रयास करना ही छोड़ देते है. कुमार अजय कहते हैं, जीवन में संघर्ष को देखकर अपने हाथ पीछे कर लें तो हम लक्ष्य तक कभी नहीं पहुंच सकते. कठिन परिस्थितियों में विवेकपूर्ण निर्णयों के साथ ही सफलता संभव है. संघर्ष का दौर जब समाप्त होता है, उसके बाद से ही सफलता का युग आरंभ होता है. संघर्ष हमारे भीतर सफलता प्राप्त करने के लिए उत्कट भाव पैदा करता है. यह हमें कठिन परिश्रम के लिए प्रेरित करता है. संघर्ष को स्वीकार कर ही सफलता के मार्ग पर अग्रसर हुआ जा सकता है.
कुमार अजय बताते हैं कि उनके पिता के गांव में बस स्टैंड पर चाय की टपरी थी, जहां स्कूल से आने के बाद वह अपने पिता का हाथ बटाते थे. गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले कुमार अजय शुरू से ही होनहार थे लेकिन घर की आर्थिक परिस्थितियां ऐसी नहीं थी कि वह आगे पढ़ सकें. कुमार अजय 11वीं की पढ़ाई के बाद काम की तलाश में जयपुर चले गए, जहां उन्हें 700 रुपए महीना पगार में मेडिकल स्टोर पर जॉब मिली लेकिन कुछ महीनों बाद ये लगने लगा ये नाकाफी है, तो उन्होंने और जॉब के प्रयास किए.
जयपुर में उप निदेशक के पद के लिए हुआ चयनकाफी तलाश के बाद उन्हें एक फैक्ट्री में चपरासी की जॉब मिली लेकिन उन्होंने इस जॉब के साथ-साथ में अपनी प्राइवेट पढ़ाई जारी रखी और ग्रेजुएशन कम्प्लीट कर लिया. इन्हीं दिनों बीमारी के चलते उन्हें गांव आना पड़ा और जॉब छूटी तो गांव के ही एक निजी स्कूल में ही उन्होंने टीचर के रूप में काम किया. मन में जिज्ञासा और कुछ कर गुजरने की तमन्ना ने उन्हें यही तक सीमित नहीं रहने दिया. एमए हिंदी, एमए राजस्थानी, यूनिवर्सिटी गोल्ड मेडलिस्ट कुमार अजय ने एमजेएमसी किया और एक समाचार पत्र के लिए काम शुरू किया. बीएड करने के बाद उन्हें पहली सफलता मिली और सरकारी अध्यापक के पद पर उनका चयन हुआ. कुछ महीने सरकारी अध्यापक की नौकरी के बाद उनका APRO के पद पर चयन हुआ, जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. APRO से PRO बने और आज जयपुर में उप निदेशक के पद पर कार्यरत हैं.
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प्रेम और प्रतिरोध के कविएक अधिकारी होने के साथ-साथ कुमार अजय एक बहुत अच्छे साहित्यकार भी हैं. बचपन से ही लिखने-पढ़ने में उनकी रूचि रही और उन्होंने इस रूचि को बेहतर ढंग से विकसित किया.प्रेम और प्रतिरोध के कवि माने जाने वाले कुमार अजय की राजस्थानी कविता पुस्तक ‘संजीवणी’ साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से प्रकाशित हुई और उसे अकादेमी का वर्ष 2013 का युवा पुरस्कार प्राप्त हुआ. उसके बाद राजस्थानी कहानी संग्रह ‘किणी रै की नी हुयौ’, राजस्थानी कविता संग्रह ‘ऊभौ हूं अजै’, राजस्थानी कहानी संग्रह ‘किणी रै की नी हुयौ’, हिंदी कविता संग्रह ‘कहना ही है तो कहो’, हिंदी डायरी ‘मैं चाहूं तो मुस्कुरा सकता हूं’ पुस्तकें लिखीं. हाल ही में प्रकाशित राजस्थानी कविता संग्रह ‘रिंकी टेलर’ राजस्थानी साहित्य जगत में बहुत चर्चाओं में हैं. इसके अलावा साहित्य अकादमी के लिए कई कृतियों का राजस्थानी अनुवाद तथा राजस्थानी पत्रिकाओं का संपादन भी कुमार अजय ने किया है.
Location :
Churu,Rajasthan
First Published :
February 10, 2025, 15:36 IST
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चाय की टपरी पर पिता का बटाया हाथ, साथ में जारी रखी पढ़ाई, अब मिला ये बड़ा पद



