Rajasthan

कल्याण अस्पताल में हार्ट व लकवे मरीजों को मुफ्त इलाज

Last Updated:November 27, 2025, 19:01 IST

सीकर और आसपास के जिलों के हार्ट और लकवे के मरीज अब जयपुर या दिल्ली जाने की जरूरत नहीं रहेगी. शेखावाटी के कल्याण अस्पताल में समय पर थ्रोम्बोलाइसिस इंजेक्शन की सुविधा उपलब्ध है, जिससे स्ट्रोक और हार्ट अटैक के दौरान खून के थक्के घुलकर मरीज की जान बचाई जा सकती है और लकवे का असर कम होता है. विशेषज्ञों के अनुसार, स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण जैसे अचानक हाथ-पैर में कमजोरी, संतुलन बिगड़ना या आवाज में बदलाव पहचानकर तीन घंटे के भीतर दवा देने पर मरीज की रिकवरी 60-70% तक संभव है.गुड न्यूज

अब सीकर सहित आसपास के जिलों के हार्ट और लकवे के मरीजों को जयपुर और दिल्ली जैसे बड़े शहरों के अस्पतालों में जाने की जरूरत नहीं है. शेखावाटी के सबसे बड़े कल्याण अस्पताल में उन्हें यह सुविधा मिल जाएगी. यहां हार्ट और लकवे के मरीजों की समय पर जान बचाई जा सकेगी, कल्याण अस्पताल में खून का थक्का घोलने में कारगर थ्रोम्बोलाइसिस इंजेक्शन की खेप पहुंच गई है. समय पर यह दवा मिलने से ब्रेन स्ट्रोक और हार्ट स्ट्रोक में जमे खून के थक्के घुल जाते हैं.

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इस दवा से मरीज की जान बचने और शरीर पर लकवे के प्रभाव कम होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है. राहत की बात है कि बाजार में खून के थक्के घोलने वाले इस इंजेक्शन की औसतन कीमत 50,000 से 75,000 रुपए तक होती है, लेकिन अब यह इंजेक्शन कल्याण अस्पताल में निशुल्क मिलने से मरीज पर लगाया जा सकेगा. वहीं, कल्याण अस्पताल में हाइटेक आईसीयू और स्थायी न्यूरोलॉजिस्ट होने के कारण, पिछले सप्ताह ही एक मरीज को थ्रोम्बोलाइसिस इंजेक्शन दिया गया.

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इसके बाद चौबीस घंटे में मरीज की रिकवरी हो गई, थ्रोम्बोलाइजिस (थ्रोम्बोलाइजिंग) से हर साल स्ट्रोक के सैकड़ों लोगों की जान आसानी से बचाई जा सकेगी. चिकित्सकों के अनुसार, आमतौर पर नस में खून का थक्का जमने से मस्तिष्क या हार्ट स्ट्रोक होता है, जिससे शरीर के अन्य अंगों में लकवे के लक्षण दिखाई देते हैं. इसके बचाव के लिए मरीज को थ्रोम्बोलाइज किया जाता है, स्ट्रोक आने के बाद, मरीज को ढाई से साढ़े तीन घंटे के बीच यह इंजेक्शन लगाने पर नसों में जमा खून का थक्का टूट जाता है और मरीज पर लकवे का असर काफी हद तक कम हो जाता है.

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चिकित्सकों के अनुसार, इस गोल्डन पीरियड में इंजेक्शन लगाने पर खून के थक्के घुल जाते हैं. इससे लकवा रुक जाता है या कम हो जाता है और मरीज सामान्य जीवन में लौट सकता है. आंकड़ों के अनुसार, हार्ट और ब्रेन स्ट्रोक के करीब 40 फीसदी मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाने के कारण थ्रोम्बोलाइज नहीं हो पाते हैं. समय पर थ्रोम्बोलाइसिस देने पर मरीज की 60 से 70 प्रतिशत तक रिकवरी हो जाती है, इससे मरीज को गंभीर अवस्था में पहुँचने से पहले ही उसकी जान बचाई जा सकती है.

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मेडिकल कॉलेज, सीकर के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. श्रीनेहा ने बताया कि व्यक्ति को अचानक हाथ-पैर में कमजोरी, पैरों में लड़खड़ाहट, शरीर का संतुलन बिगड़ना, या आवाज में बदलाव स्ट्रोक या लकवे के प्रारंभिक लक्षण हो सकते हैं. 50 साल से अधिक उम्र के लोगों में निशक्तता का सबसे बड़ा कारण स्ट्रोक माना जाता है. उन्होंने बताया कि यह आमतौर पर हाई ब्लड प्रेशर, शुगर, हाई कोलेस्ट्रॉल अथवा अनियमित दिल की धड़कन जैसी बीमारियों में स्ट्रोक की संभावना सामान्य व्यक्ति की तुलना में दोगुनी होती है.

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न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. श्रीनेहा का कहना है कि स्ट्रोक आने के तुरंत बाद का समय काफी महत्वपूर्ण होता है. स्ट्रोक आने के बाद करीब तीन घंटे के दौरान मरीज को थ्रोम्बोलाइज करने पर लकवे के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है और मरीज की रिकवरी भी जल्दी होती है. कई बार जागरूकता के अभाव में मरीज के परिजन देरी कर देते हैं, जिससे मरीज को गंभीर नुकसान होता है.

First Published :

November 27, 2025, 19:01 IST

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अब सीकर के कल्याण अस्पताल में हार्ट व लकवे मरीजों को मिलेगा मुफ्त इलाज

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