घूमर: राजस्थान की रंगीन परंपरा, स्त्री-संस्कृति और लोक संगीत का जीवंत उत्सव, विश्वभर में है लोकप्रिय!

Last Updated:December 17, 2025, 12:20 IST
राजस्थान की लोक-संस्कृति अपनी भव्यता, रंगों और परंपराओं के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है. इसी सांस्कृतिक विरासत का एक अनमोल रत्न है घूमर नृत्य.यह नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि राजस्थान की नारी-संस्कृति, सामाजिक मर्यादा और परंपरागत जीवनशैली का जीवंत प्रतिबिंब है. घूमर शब्द ‘घूमना’ से निकला है.
राजस्थान की लोक-संस्कृति अपनी भव्यता, रंगों और परंपराओं के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है. इसी सांस्कृतिक विरासत का एक अनमोल रत्न है घूमर नृत्य. यह नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि राजस्थान की नारी-संस्कृति, सामाजिक मर्यादा और पारंपरिक जीवनशैली का जीवंत प्रतिबिंब भी है. ‘घूमर’ शब्द ‘घूमना’ से निकला है, जो इसकी गोलाकार, लयबद्ध और सौम्य गतियों को दर्शाता है. घूमर नृत्य को देखकर राजस्थान की मिट्टी की खुशबू, लोक जीवन की सादगी और उत्सवों की उमंग एक साथ महसूस होती है. यह नृत्य स्त्रियों के सौंदर्य, धैर्य और गरिमा को अत्यंत सहज रूप में प्रस्तुत करता है.

घूमर नृत्य की उत्पत्ति राजस्थान के भील जनजाति समुदाय से मानी जाती है, प्रारंभ में यह देवी-देवताओं की आराधना और शुभ अवसरों पर किया जाने वाला नृत्य था. बाद में राजपूत समाज ने इसे अपनाया और राजदरबारों तथा महलों की परंपरा का हिस्सा बना दिया. समय के साथ घूमर नृत्य राजस्थान के हर क्षेत्र में फैल गया और यह राज्य की सांस्कृतिक पहचान बन गया. विशेष रूप से तीज, गणगौर, विवाह, पुत्रजन्म और अन्य मांगलिक अवसरों पर घूमर नृत्य का आयोजन किया जाता है. विवाह के बाद नवविवाहिता द्वारा पहली बार ससुराल में घूमर करना शुभ माना जाता है.

घूमर नृत्य महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से किया जाता है, इसमें महिलाएं गोल घेरा बनाकर धीमी ताल में घूमती हैं. नृत्य की गति धीरे-धीरे तेज होती जाती है, जिससे लहंगे का घेरा सुंदर लहरों के रूप में फैलता है. यह नृत्य अत्यंत शालीन, मर्यादित और भावनात्मक होता है, घूमर में चेहरे के भाव सीमित होते हैं, क्योंकि इसका सौंदर्य शरीर की गति और ताल में निहित होता है. सिर को हल्का झुकाकर और हाथों की कोमल मुद्राओं के साथ किया गया यह नृत्य स्त्री गरिमा का अद्भुत उदाहरण है.
Add as Preferred Source on Google

घूमर नृत्य की वेशभूषा इसकी सबसे बड़ी पहचान है. महिलाएँ रंग-बिरंगे घेरदार घाघरे, कांचली और ओढ़नी पहनती हैं. घाघरे की चौड़ी घेर नृत्य के दौरान विशेष आकर्षण पैदा करती है. आभूषणों में बोरला, झुमके, कंठी, बाजूबंद, चूड़ियाँ और पायजेब पहनी जाती हैं. ये पारंपरिक आभूषण नृत्य की भव्यता और सौंदर्य को कई गुना बढ़ा देते हैं. घूमर नृत्य लोक संगीत के बिना अधूरा है. इसमें ढोलक, नगाड़ा, मंजीरा, शहनाई और सारंगी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों का प्रयोग होता है. गीतों में लोक जीवन, ऋतु परिवर्तन, भक्ति, प्रेम और सामाजिक भावनाओं का वर्णन मिलता है. लोक गायन की सरल भाषा और मधुर धुनें नृत्य को आत्मा से जोड़ देती हैं.

घूमर नृत्य राजस्थान की नारी शक्ति, सामूहिकता और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है. यह नृत्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी परंपराओं के संरक्षण का माध्यम बना हुआ है. आज घूमर नृत्य राज्य उत्सवों, पर्यटन महोत्सवों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राजस्थान की पहचान बन चुका है. यूनेस्को द्वारा राजस्थानी लोक नृत्यों को दी गई मान्यता ने घूमर को वैश्विक स्तर पर और भी प्रतिष्ठा प्रदान की है.

घूमर नृत्य राजस्थान की आत्मा में रचा-बसा वह लोक नृत्य है, जिसमें परंपरा, सौंदर्य और संस्कृति का अनुपम संगम दिखाई देता है. इसकी लयबद्ध गतियाँ, रंगीन वेशभूषा और सांस्कृतिक गहराई हर दर्शक को मंत्रमुग्ध कर देती हैं. घूमर नृत्य न केवल राजस्थान का गौरव है, बल्कि भारतीय लोक विरासत की अमूल्य धरोहर भी है.
First Published :
December 17, 2025, 12:20 IST
homerajasthan
जानिए क्यों घूमर नृत्य है राजस्थान की लोक-संस्कृति और नारी गरिमा का प्रतीक



