Birsa Munda Birth Anniversary: कैसे बिरसा मुंडा बने आदिवासी समाज के भगवान? जानिए कौन थे जंगलों के यह महान वीर

Last Updated:November 15, 2025, 11:40 IST
Birsa Munda 150th Birth Anniversary: देशभर में आदिवासी समुदाय अपने वीर नायक बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती मना रहा है. झारखंड के उलीहातु में जन्मे बिरसा ने कम उम्र में ही अंग्रेजों और जमींदारी शोषण के खिलाफ “उलगुलान” यानी “महाविद्रोह” की अगुवाई की. उन्होंने आदिवासी पहचान, जमीन, संस्कृति और सम्मान की रक्षा के लिए एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया. 9 जून 1900 को संदिग्ध परिस्थितियों में रांची जेल में उनकी मौत हुई, लेकिन वे आज भी “जनजातीय गौरव दिवस” के प्रतीक हैं. राजस्थान के डूंगरपुर में भी राज्य स्तरीय कार्यक्रमों के साथ उनकी जयंती मनाई जा रही है. 
देशभर में आज आदिवासी समुदाय अपने सबसे बड़े नायक बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती मना रहा है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर बिरसा मुंडा कौन थे? क्यों आदिवासी उन्हें भगवान की तरह पूजते हैं और कैसे उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ ऐसा आंदोलन खड़ा किया जिसे “उलगुलान” यानी “महाविद्रोह” कहा गया? उनकी कहानी आज भी आदिवासी समाज की पहचान और सम्मान का प्रतीक है.

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को झारखंड के उलीहातु गांव में हुआ. बचपन से ही वे जंगल-जमीन और अपनी पारंपरिक संस्कृति के बेहद करीब थे. पढ़ाई के दौरान उन्होंने मिशनरियों और अंग्रेजों द्वारा आदिवासियों पर किए जा रहे अत्याचारों को महसूस किया. इसी ने उनके भीतर अन्याय के खिलाफ आग जलाई और वे धीरे-धीरे समुदाय में एक प्रमुख नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरने लगे.

बहुत कम उम्र में ही बिरसा में ऐसा करिश्मा था कि लोग उन्हें दिव्य पुरुष मानने लगे. उन्होंने समाज में स्वच्छता, एकता और अपनी परंपराओं को मजबूत करने की बात की. आदिवासियों की जमीन हड़पने, उन पर कर लगाने और शोषण करने वाली अंग्रेजी और जमींदारी व्यवस्था के खिलाफ उन्होंने खुलकर आवाज उठाई. यही आवाज आगे चलकर “उलगुलान” आंदोलन बनी, जो आदिवासी इतिहास में एक बड़ी क्रांति के रूप में दर्ज है.

बिरसा मुंडा ने अपने लोगों में आत्मविश्वास जगाया और उन्हें संगठित होकर अत्याचार का मुकाबला करने का संदेश दिया. उनकी बातों ने आदिवासी समाज को नई ताकत दी. उस दौर में उनकी आवाज आदिवासी क्षेत्रों में “इंकलाब जिंदाबाद” की तरह ही क्रांति का बिगुल बन चुकी थी. अंग्रेजों ने उनके प्रभाव से डरकर उन्हें कई बार दबाने की कोशिशें कीं, लेकिन बिरसा हमेशा डटे रहे.

1900 में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और 9 जून 1900 को रांची जेल में संदिग्ध हालात में उनकी मौत हो गई. मात्र 25 वर्ष की उम्र में उन्होंने ऐसा इतिहास रचा, जो सदियों तक आदिवासी पहचान का आधार बना रहेगा. उनकी 150वीं जयंती पर डूंगरपुर में भी राज्य स्तरीय कार्यक्रम आयोजित हो रहा है.

इस कार्यक्रम में राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों के हजारों लोग शामिल होंगे. सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ बिरसा मुंडा के योगदान को याद किया जाएगा और आदिवासी गौरव, परंपरा और संघर्ष की विरासत को सम्मान दिया जाएगा. राज्य सरकार भी इस मौके पर कई जनजातीय विकास योजनाओं की समीक्षा और नए कार्यक्रमों की घोषणा करने की तैयारी में है.

आज भी बिरसा मुंडा सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, साहस और न्याय के प्रतीक हैं. उनकी जयंती को पूरे देश में “जनजातीय गौरव दिवस” के रूप में मनाया जाता है और उनकी संघर्षगाथा नई पीढ़ी को अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देती है.
First Published :
November 15, 2025, 11:40 IST
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कैसे बिरसा मुंडा बने आदिवासी समाज के भगवान? जानिए कौन थे जंगलों के यह महान वीर



