जयसिंहपुरा में हेतराम प्रजापत ने दीपावली पर मिट्टी के दीप जलाए

दौसा. दीपावली का पर्व आते ही जैसे पूरे देश में उजियारा फैलता है, वैसे ही जयसिंहपुरा गांव के हेतराम प्रजापत और उनकी पत्नी की ज़िंदगी में भी हर साल नई चमक भर जाती है. उनके हाथों की मेहनत और मिट्टी की खुशबू से बने दीपक सिर्फ घरों को ही नहीं, बल्कि उनकी ज़िंदगी को भी रोशन कर रहे हैं.
गांव की गलियों में जब चाक घूमता है, तो उसके साथ-साथ जयसिंहपुरा निवासी हेतराम और उनकी पत्नी के सपने भी घूमते हैं. सुबह की पहली किरण के साथ ही दोनों पति-पत्नी अपने छोटे से कार्य में जुट जाते हैं. एक तरफ हेतराम मिट्टी को चाक पर आकार दे रहे होते हैं, तो दूसरी ओर उनकी पत्नी उन्हीं दीपकों को सावधानी से सुखाने और पकाने की तैयारी करती हैं. दिनभर की मेहनत के बाद शाम तक हजारों दीपक तैयार हो जाते हैं जो आगे जयपुर, दौसा और आसपास के जिलों में उजाला फैलाने निकल पड़ते हैं.
तीन साल पहले तक बेरोजगार थे हेतराम
हेतराम बताते हैं कि तीन साल पहले तक वे बेरोजगार थे. गांव में काम की तलाश करते थे, लेकिन कोई स्थायी रोज़गार नहीं मिल पाया. पहले दुकानों पर बैठता था, कभी-कभी तो खर्चा ज्यादा और आमदनी कुछ नहीं होती थी. लेकिन जब चाक उठाया, तो लगा जैसे किस्मत ने रोशनी की राह दिखा दी. आज यह दंपति साल भर दीपक बनाने का काम करते हैं और दीपावली के समय में उनकी मांग कई गुना बढ़ जाती है. हेतराम बताते हैं, “त्योहार के दिनों में तो फुर्सत ही नहीं मिलती मैं और मेरी पत्नी मिलकर रोज़ करीब 5,000 से अधिक दीपक तैयार करते हैं. बिजली के चाक की मदद से मिट्टी को आकार देते हैं, फिर इन्हें धूप में सुखाकर भट्टी में पकाया जाता है. उसके बाद इन्हें ट्रक में भरकर जयपुर, दौसा और अन्य जिलों में भेज दिया जाता है.
चाक पर उसे संतुलन में रखना कला है
मिट्टी से लेकर बाजार तक की यह यात्रा आसान नहीं होती, हेतराम बताते हैं कि मिट्टी की खुदाई, उसे गूंथना, चाक पर घुमाना, फिर पकाना हर चरण में बहुत श्रम और धैर्य की जरूरत होती है. मिट्टी को कई घंटे तक पानी में भिगोना पड़ता है ताकि वह मुलायम हो जाए और आकार लेने योग्य बन सके. चाक पर उसे संतुलन में रखना कला है, और वही कला अब हमारा जीवन बन गई है. हालांकि हेतराम यह भी मानते हैं कि समय के साथ चुनौतियां बढ़ी हैं पहले दीपक सस्ते बन जाते थे, अब मिट्टी, लकड़ी और ईंधन सब महंगे हो गए हैं.
मेहनत के हिसाब से आमदनी कम मिलती है, लेकिन खुशी इस बात की है कि लोग अब भी मिट्टी के दीपक को दिल से अपनाते हैं. इलेक्ट्रिक झालरों के बावजूद असली दीपक का उजाला आज भी हर घर में अपनी पहचान बनाए हुए है. गांव के लोग भी अब हेतराम को प्रेरणा की तरह देखने लगे हैं. उनका नाम अब सिर्फ जयसिंहपुरा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आस-पास के गांवों में भी उनकी मेहनत की मिसाल दी जाती है.



