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राजस्थान की गर्म मिट्टी में खिला हिमाचल का फूल, किसानों ने दिखाई नवाचार की मिसाल, लाखों में कमा रहे मुनाफा

अलवर. राजस्थान के अलवर जिले के खैरथल-तिजारा क्षेत्र में किसान अब पारंपरिक फसलों को छोड़कर फूलों की खेती की ओर रुख कर रहे हैं. यहां के किसान हिमाचल प्रदेश और शिमला की ठंडी जलवायु में उगने वाले गुलदाउदी (गुलदावरी) के फूलों की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं. सामान्यतः 20-25 डिग्री तापमान में पनपने वाले इन फूलों की खेती राजस्थान की गर्म और शुष्क जलवायु में चुनौतीपूर्ण है, लेकिन किसानों की मेहनत और नवाचार से यह संभव हो गया है. तिजारा के किसान खुले खेतों में पारंपरिक तरीके से इसकी फसल उगा रहे हैं, जबकि शिमला में यह ग्रीनहाउस में की जाती है. इस खेती से न केवल उनकी आय बढ़ी है, बल्कि क्षेत्र में फ्लोरिकल्चर का नया दौर शुरू हो गया है.

तिजारा निवासी किसान अजय कुमार सैनी ने बताया कि अकेले तिजारा में किसानों ने करीब 50 बीघा भूमि पर गुलदाउदी की खेती शुरू कर दी है. इस फूल की पौधें शिमला से मंगवाई जाती हैं और मार्च महीने में रोपाई की जाती है. लगभग 9 महीनों में पौधे तैयार हो जाते हैं, जिसकी तुड़ाई नवंबर के पहले सप्ताह से शुरू हो जाती है. अजय कहते हैं, “हम खुद दिल्ली की गाजीपुर मंडी में फूल बेचने जाते हैं, जहां इनकी अच्छी मांग रहती है. एक बीघा से तीन बार की तुड़ाई में 1.5 से 2 क्विंटल फूल निकलते हैं.” अन्य किसानों ने भी साझा किया कि इस साल फसल अच्छी हुई है और दिल्ली मंडी में फूलों का भाव 200-250 रुपये प्रति किलो तक रहा.

गुलदाउदी की खेती में मौसम की मार सबसे बड़ी समस्या

गुलदाउदी की खेती में मौसम की मार सबसे बड़ी समस्या है. किसानों के अनुसार, अधिक गर्मी और अचानक बारिश से फसल खराब हो जाती है. इससे जड़ गलन (रूट रॉट) और झुलसा रोग (ब्लाइट) लगने का खतरा बढ़ जाता है. कई बार इन रोगों के कारण पूरी फसल बर्बाद हो जाती है, जिससे पौध, दवाइयों और मजदूरी पर किया गया खर्च व्यर्थ चला जाता है. तिजारा के किसान अशोक गुर्जर ने बताया, “पिछले साल भारी बारिश से 10 बीघा फसल प्रभावित हुई, लेकिन हमने जैविक कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ाया है. अब ड्रिप इरिगेशन से पानी की बचत हो रही है और फूलों की गुणवत्ता बेहतर बन रही है.” कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, अच्छे जल निकासी वाली दोमट मिट्टी और pH 6-7 वाली भूमि इस खेती के लिए आदर्श है. किसान गोबर की खाद के साथ नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का संतुलित उपयोग कर रहे हैं.

पारंपरिक विधि से गुलदाउदी की खेती कर रहे हैं किसान

तिजारा के किसान गुलदाउदी की खेती पूरी तरह पारंपरिक तरीके से कर रहे हैं. शिमला जैसे ठंडे क्षेत्रों में जहां ग्रीनहाउस की जरूरत पड़ती है, वहीं यहां खुले आसमान के नीचे ड्रिप पद्धति से सिंचाई की जा रही है. इससे फूलों की रंगत और ताजगी बरकरार रहती है. एक बीघा खेती पर पौध, दवाइयों, मजदूरी और अन्य खर्च मिलाकर लगभग 50,000 रुपये लगते हैं. यदि बाजार भाव अच्छा रहा, तो तीन तुड़ाई से 4 लाख रुपये तक का मुनाफा हो जाता है. अजय सैनी ने कहा, “50 बीघा पर कुल फसल से तिजारा के किसान करोड़ों रुपये के फूल दिल्ली भेजते हैं. यह खेती हमें साल भर रोजगार देती है.”

उद्यान विभाग ने शुरू की है अनुदान योजना

अलवर जिले में फ्लोरिकल्चर को बढ़ावा देने के लिए उद्यान विभाग ने अनुदान की योजना शुरू की है, जिसमें ड्रिप सिस्टम और हाई-टेक नर्सरी पर सब्सिडी मिल रही है. खैरथल-तिजारा क्षेत्र, जो कभी सूखाग्रस्त माना जाता था, अब फूलों का हब बन रहा है. किसान बताते हैं कि गुलदाउदी के अलावा गेंदा और गुलाब की खेती भी बढ़ रही है, लेकिन गुलदाउदी की मांग दिल्ली-एनसीआर में सबसे ज्यादा है. हालांकि, जलवायु परिवर्तन के कारण रोग नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना पड़ रहा है. कृषि वैज्ञानिकों का सुझाव है कि किसान बीजोपचार और जैविक खाद का अधिक उपयोग करें.

इस सफलता से प्रेरित होकर आसपास के गांवों में भी किसान इस खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं. तिजारा के किसान समूह बनाकर मंडी तक परिवहन की व्यवस्था कर रहे हैं. अलवर के उद्यान विभाग के अधिकारी लीलाराम जाट ने कहा, “हम किसानों को प्रशिक्षण और बाजार लिंकेज प्रदान कर रहे हैं. गुलदाउदी जैसी फसलों से राजस्थान फूलों का निर्यातक बन सकता है.” कुल मिलाकर, तिजारा के किसान साबित कर रहे हैं कि मेहनत और नवाचार से कोई भी चुनौती जीती जा सकती है.

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