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दिल्ली से दक्कन तक मोहब्बत की सल्तनत! ख्वाजा गेसूदराज ने कैसे जीते करोड़ों दिल

Last Updated:December 22, 2025, 15:33 IST

Hazrat Gesudaraz Dargah : भारतीय सूफी परंपरा के महान संत हजरत ख्वाजा बंदा नवाज गेसूदराज ने मोहब्बत, इंसानियत और सहिष्णुता का ऐसा पैगाम दिया, जिसने उत्तर और दक्षिण भारत को एक रूहानी डोर में बांध दिया. उनका जीवन सत्ता नहीं, सेवा और प्रेम की ताकत का प्रतीक रहा है.

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जयपुर : भारतीय सूफी परंपरा में हजरत ख्वाजा बंदा नवाज गेसूदराज का नाम एक ऐसे रौशन सितारे की तरह है जिन्होंने न केवल इस्लाम की रूहानी शिक्षाओं का प्रचार किया बल्कि उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक सेतु का कार्य भी किया. दिल्ली के प्रसिद्ध सूफी संत नसीरुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली के प्रिय शिष्य ख्वाजा साहब का व्यक्तित्व ज्ञान, प्रेम और सहिष्णुता का संगम था.

1398 ईस्वी में जब तैमूर लंग के आक्रमण के कारण दिल्ली के हालात बिगड़ने लगे तब लगभग 80 वर्ष की आयु में ख्वाजा साहब ने दक्षिण यानी दक्कन की ओर रुख किया. उस समय गुलबर्गा में बहमन सल्तनत का शासन था. जब वे गुलबर्गा पहुंचे तो सुल्तान ताजुद्दीन फिरोज शाह ने स्वयं शहर के बाहर आकर उनका स्वागत किया. सुल्तान से लेकर आम आवाम तक हर कोई उनकी सादगी और इल्म का कायल हो गया.

गेसूदराज नाम के पीछे की कहानीमौलाना साहिब अंसार के अनुसार ख्वाजा साहब का वास्तविक नाम सैयद मोहम्मद यूसुफ हुसैनी था लेकिन इतिहास उन्हें गेसूदराज के नाम से जानता है. कहा जाता है कि एक बार अपने मुर्शिद की पालकी उठाते समय उनकी लंबी जुल्फें पालकी के नीचे दब गईं लेकिन गुरु के प्रति सम्मान और प्रेम के कारण उन्होंने दर्द सहा पर पालकी नहीं छोड़ी. इसी अटूट निष्ठा के कारण उन्हें यह उपाधि मिली.

इंसानियत का सबसे बड़ा सबकख्वाजा साहब का सबसे बड़ा संदेश मोहब्बत और खिदमत-ए-खल्क था. उनका मानना था कि इबादत केवल सजदों में नहीं बल्कि भूखे को खाना खिलाने और मजलूमों के आंसू पोंछने में है. उन्होंने सिखाया कि ईश्वर एक है रास्ते अलग हो सकते हैं लेकिन गंतव्य सबका वही प्रेम स्वरूप ईश्वर है. उन्होंने स्थानीय लोगों से जुड़ने के लिए दकनी को अपनाया. वे पहले ऐसे सूफी थे जिन्होंने आम बोलचाल की भाषा में साहित्य रचा जिससे हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों के बीच की दूरियां कम हुईं.

एकता का जीवंत प्रतीक दरगाह शरीफआज भी गुलबर्गा की दरगाह शरीफ केवल मुसलमानों के लिए नहीं बल्कि हर धर्म के अनुयायियों के लिए आस्था का केंद्र है. यहां लगने वाला उर्स सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल पेश करता है. यहां आने वाला हर जायरीन, चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो, एक ही कतार में खड़ा होकर शांति और सुकून की दुआ मांगता है. हजरत गेसूदराज का जीवन हमें सिखाता है कि सत्ता और सल्तनत बदलती रहती है लेकिन जो दिल जीतते हैं उनकी हुकूमत सदियों तक कायम रहती है.

About the AuthorRupesh Kumar Jaiswal

A Delhi University graduate with a postgraduate Diploma in Journalism and Mass Communication, I work as a Content Editor with the Rajasthan team at India Digital. I’m driven by the idea of turning raw in…और पढ़ें

Location :

Jaipur,Rajasthan

First Published :

December 22, 2025, 15:33 IST

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हजरत ख्वाजा बंदा नवाज की सूफी विरासत और गुलबर्गा दरगाह

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