केरल में कैसे बदला सियासी मिजाज? UDF के लिए संजीवनी, पिनाराई विजयन की LDF दबाव में, भाजपा के लिए नई जमीन

तिरुवनंतपुरम. केरल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी है. ये परिणाम सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं हैं, बल्कि वे जनता के मूड, सत्ता-विरोधी रुझान और उभरते राजनीतिक बदलावों का साफ संकेत देते हैं. कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) के लिए ये नतीजे संजीवनी साबित हुए हैं. लंबे समय से संघर्ष कर रहे यूडीएफ को इन चुनावों में व्यापक सफलता मिली, जिससे उसे विधानसभा चुनाव से पहले आत्मविश्वास और मनोवैज्ञानिक बढ़त मिली है. चार नगर निगम, दर्जनों नगरपालिकाएं, जिला और प्रखंड पंचायतों में जीत यह संकेत देती है कि ग्रासरूट स्तर पर यूडीएफ की पकड़ मजबूत हुई है.
इसके उलट, सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) के लिए ये नतीजे चेतावनी की घंटी हैं. लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की तैयारी कर रहे एलडीएफ को यह साबित करना होगा कि उसका जनाधार अभी भी बरकरार है. कल्याणकारी योजनाओं, पेंशन वृद्धि और सामाजिक सुरक्षा जैसे कदम भी मतदाताओं को पूरी तरह साधने में सफल नहीं दिखे. इससे यह संकेत मिलता है कि सिर्फ योजनाएं नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता और जनता से संवाद भी निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं.
इन नतीजों का तीसरा और सबसे दिलचस्प पहलू भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का प्रदर्शन है. केरल की पारंपरिक द्विध्रुवीय राजनीति – यूडीएफ बनाम एलडीएफ – में भाजपा की जीत, खासकर तिरुवनंतपुरम नगर निगम पर कब्जा, एक बड़ा राजनीतिक संकेत है. भले ही विधानसभा में भाजपा का अभी कोई विधायक न हो, लेकिन स्थानीय स्तर पर उसकी मौजूदगी यह बताती है कि राज्य की राजनीति अब पूरी तरह दो खेमों तक सीमित नहीं रही.
यूडीएफ का दावा है कि शबरिमला से जुड़े मुद्दे, भ्रष्टाचार के आरोप, भाई-भतीजावाद और सरकार की कथित जन-विरोधी नीतियों ने सत्ता-विरोधी लहर को मजबूत किया. वहीं एलडीएफ ने हार के लिए अप्रत्याशित राजनीतिक परिस्थितियों और विपक्ष के गठजोड़ को जिम्मेदार ठहराया है, साथ ही वापसी का भरोसा भी जताया है. सत्तारूढ़ गठबंधन प्रचार के दौरान मुख्य रूप से राज्य सरकार के विभिन्न सामाजिक कल्याण और विकास कार्यक्रमों, पलक्कड़ से विधायक राहुल ममकूटाथिल के खिलाफ आरोपों और यूडीएफ के जमात-ए-इस्लामी के साथ कथित संबंधों पर निर्भर था. एलडीएफ ने स्वीकार किया कि उसे इस तरह के बड़े झटके की उम्मीद नहीं की थी.
नतीजे संकेत देते हैं कि निकाय चुनाव से ठीक पहले एलडीएफ सरकार द्वारा घोषित कल्याणकारी उपाय, जिनमें सामाजिक सुरक्षा और कल्याण पेंशन में वृद्धि, आशा कार्यकर्ताओं के लिए उच्च मानदेय और एक नई महिला सुरक्षा योजना शामिल है, और कई अन्य वित्तीय पैकेज प्रभावी साबित नहीं हुए. हालांकि, एलडीएफ नेतृत्व ने कहा कि पार्टी और मोर्चे को अतीत में इससे भी अधिक गंभीर असफलताओं का सामना करना पड़ा था, लेकिन उन्होंने जनता का विश्वास फिर से हासिल किया और बाद में जोरदार वापसी की.
माकपा राज्य सचिवालय ने एक बयान में कहा, “पार्टी ने हर चरण में उचित आकलन करने और आवश्यक सुधार करने के बाद ही आगे कदम बढ़ाया है. जनता का विश्वास पुनः प्राप्त करना और ऐसे सुधारों के माध्यम से और भी मजबूत होकर वापसी करना पार्टी के इतिहास का हिस्सा है.” माकपा ने यूडीएफ पर खुलेआम और गुप्त रूप से सभी सांप्रदायिक ताकतों के साथ साठगांठ कर चुनाव लड़ने का आरोप लगाया. वाम मोर्चे ने भाजपा की बड़ी जीत के दावे को खारिज करते हुए कहा कि यह तथ्यों से मेल नहीं खाते.
सत्तारूढ़ गठबंधन प्रचार के दौरान मुख्य रूप से राज्य सरकार के विभिन्न सामाजिक कल्याण और विकास कार्यक्रमों, पलक्कड़ से विधायक राहुल ममकूटाथिल के खिलाफ आरोपों और यूडीएफ के जमात-ए-इस्लामी के साथ कथित संबंधों पर निर्भर था.एलडीएफ ने स्वीकार किया कि उसे इस तरह के बड़े झटके की उम्मीद नहीं की थी. कुल मिलाकर, ये नतीजे यह साफ करते हैं कि केरल का आगामी विधानसभा चुनाव त्रिकोणीय संघर्ष की ओर बढ़ रहा है, जहां यूडीएफ उत्साहित है, एलडीएफ सतर्क है और भाजपा नई संभावनाएं तलाश रही है. जनता का संदेश स्पष्ट है – राजनीतिक दलों को अब जमीनी काम, भरोसे और स्पष्ट एजेंडे के साथ मैदान में उतरना होगा.


