Rajasthan

मैं हूं जयपुर! 298 वर्षों की विरासत और वास्तुकला का जीवंत शहर, दुनिया को अब भी करता हूं आकर्षित

जयपुर. मैं जयपुर हूं, वह शहर जो समय के साथ खुद को लगातार संवारता और बदलता रहा है. मैं वही जयपुर हूं, जहां राजस्थान की संस्कृति, परंपरा और इतिहास के पन्ने एक अनोखी किताब की तरह बसते हैं. मैं सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि जीता-जागता इतिहास हू, जो विरासत को कंधे पर लिए आगे बढ़ता है. आज मैं अपना 298वां स्थापना दिवस मना रहा हूं. 18 नवंबर 1727 को महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने मेरी नींव रखी थी.

उस दिन से लेकर आज तक दुनिया मुझे सिर्फ एक शहर के रूप में नहीं, बल्कि गुलाबी नगरी के रूप में जानती है. हवा महल, जंतर-मंतर, आमेर किला, सिटी पैलेस ये इमारतें मेरी आत्मा है, जो मेरे और राजस्थान के इतिहास को चुपचाप बयां करती रहती है. मेरे नाम से ही लोगों के जेहन में गुलाबी रंग की दीवारें, नक्काशीदार झरोखे और चौड़े राजसी रास्ते उभर आते हैं. यही मेरी सबसे बड़ी पहचान है. दुनियाभर से लोग हर दिन मेरी सुंदरता निहारने आते हैं और मैं हर आने वाले को अपनी विरासत की कहानी सुनाता हूं.

बदलते समय के साथ संवरता गया गुलाबी नगर

बस 2 साल बाद मेरे 300 साल पूरे होने वाले हैं, लेकिन नींव के पहले दिन से लेकर आज तक मैंने खुद को कला, संस्कृति, विज्ञान, राजनीति, व्यापार, शिक्षा और मनोरंजन हर क्षेत्र में निखरते देखा है. जनसंख्या बढ़ी, स्वरूप बदला, लेकिन मेरी मूल आत्मा अटूट रही. इतिहासकार बताते हैं कि जब मेरी नींव रखी गई थी, तब वास्तुशिल्प और शहर नियोजन पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया गया था ताकि सदियों बाद भी मैं अपने अनोखे रूप में बना रहूं. आज मैं स्मार्ट सिटी हूं, विकासशील हूं, वैश्विक पटल पर पहचाना जाने वाला शहर हूं फिर भी मेरे बाजार, प्राचीन मंदिर, खेल के मैदान और सड़कों की वास्तुकला में वही पुराना जादू बरकरार है.

कला, विरासत और इतिहास का संगम है जयपुर

सैकड़ों प्राचीन मंदिरों के कारण मुझे “छोटी काशी” कहा जाता है. मिट्टी की कला से लेकर पत्थर की नक्काशी तक, नौ दरवाजों वाले शहर से लेकर पहाड़ियों पर बने किलों तक मैं भारत का सबसे ज्यादा पर्यटकों वाला शहर हूं. विश्व की बड़ी राजनीतिक हस्तियों से लेकर नामचीन मेहमानों के स्वागत का गवाह भी मैं ही रहा हूं. सवाई मानसिंह द्वितीय के शासन के अंतिम दिनों में हाथ से बना आखिरी सोने का सिक्का भी यहीं जारी हुआ था, जिसकी कीमत उस समय 28 रुपये थी. ऐसी अनगिनत कहानियां मेरे इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं. 298 साल का सफर पूरा करके भी मैं आज भी वही गुलाबी, जीवंत और अमर जयपुर हूं.

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