300 साल पहले भारत आया था ‘हिमयुग’, जमने लगी यमुना-गंगा, धीमी पड़ गई सूर्य की रोशनी

क्या आपको मालूम है कि केवल 200-300 साल पहले भारत में एक छोटा हिमयुग आया था. इसका भीषण दौर कम से कम 70 सालों तक चला. हालांकि असर तो 100 से 200 साल तक कहा जाता है. फिर विदा हो गया. तब भारत में आज की तुलना कहीं ज्यादा कड़ाके की ठंड पड़ने लगी.इसे लिटिल आइस एज कहा गया. वैसे आपको बता दें कि ये लघु हिमयुग केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के उत्तरी गोलार्द्ध में 16वीं से 19वीं शताब्दी के बीच रहा. तब गंगा और यमुना जैसी नदियों में बर्फ जम जाती थी.
वैसे आप ये मत सोचिएगा कि लिटल आइस एज का मतलब कोई संपूर्ण हिमयुग था बल्कि ये वैश्विक तापमान में करीब 1 से 2 डिग्री सेंटीग्रेड की गिरावट का दौर था. यूरोप में नदियां पूरी तरह जम गईं. भारत में भी नदियों में बर्फ नजर आने लगी. खासकर दिल्ली में लोगों ने यमुना के किनारों पर बर्फ जमी देखी.
गंगा – यमुना के किनारों पर बर्फ
कड़ाके की ठंड में गंगा और यमुना जैसी नदियों के शांत हिस्सों और किनारों पर बर्फ की मोटी परतें जमना सामान्य बात थी. मुगल काल के कुछ संस्मरणों और शुरुआती ब्रिटिश यात्रियों के वृत्तांतों में उत्तर भारत की भीषण ठंड का जिक्र मिलता है. कुछ पुरानी कहानियों में यह कहा गया है कि सर्दियों में यमुना का पानी इतना ठंडा और स्थिर हो जाता था कि वह “बर्फ जैसा” दिखता था.
गंगा नदी की मुख्य धाराएं भागीरथी और अलकनंदा उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों से निकलती हैं. सर्दियों में तापमान बहुत गिरने पर नदी के किनारे और शांत बहाव वाले हिस्से जम जाते थे. हाल के वर्षों में भी हर्षिल के पास भागीरथी नदी के जमने की खबरें आती रही हैं.
दिल्ली और आगरा जैसे शहरों में रात का तापमान आज के मुकाबले कहीं ज्यादा नीचे गिर जाता था. मुगलकालीन लेखों में सर्दियों के दौरान पानी के बर्तनों में बर्फ जमने और फसलों पर पाला गिरने के बारे में लिखा गया है.
कश्मीर में झेलम नदी के पूरी तरह जमने के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं, तब लोग इस नदी के ऊपर पैदल चलते थे. रिकॉर्ड बताते हैं कि 1893, 1964 और 1986 जैसी भीषण सर्दियों में भी झेलम नदी इतनी जम गई थी कि लोग उसके ऊपर से पैदल पार कर सकते थे. हालांकि, अब ग्लोबल वार्मिंग के कारण ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है.
लद्दाख में बहने वाली जांस्कर नदी भारत की सबसे प्रसिद्ध “जमने वाली नदी” है. लद्दाख में बहने वाली ये अब भी सर्दियों में बर्फ के साथ जम जाती है. तब ये और ठोस तरीके से जम जाती थी. लोग इस पर लोग मीलों पैदल चलते थे. 300 साल पहले भी यह नदी जांस्कर घाटी के लोगों के लिए सर्दियों में आने-जाने का एकमात्र रास्ता हुआ करती थी.
भारत पर क्या असर पड़ा
लिटल आइस एज के दौरान भारत में मानसून की अनिश्चितता बढ़ गई. 1630-32 का ‘दक्कन का अकाल’ और 1770 का ‘बंगाल का अकाल’ इसी दौर की देन थे. जब तापमान गिरता था, तो वाष्पीकरण कम होता था, जिससे मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती थीं और भारत में सूखा पड़ता था.
1630-32 का दक्कन अकाल इसी दौर में आया. तब शाहजहां का शासनकाल था. इस अकाल को भारत के इतिहास का सबसे भीषण अकाल माना जाता है. रिकॉर्ड बताते हैं कि बारिश बिल्कुल नहीं हुई और लाखों लोग भूख से मर गए. 1770 में ब्रिटिश शासन की शुरुआत में बंगाल में आई अकाल इसी जलवायु अस्थिरता का परिणाम था, जिसमें बंगाल की एक-तिहाई आबादी खत्म हो गई.
खेती का पैटर्न बदला
कम बारिश और ज्यादा ठंड को देखते हुए किसानों ने अपनी फसलों के चुनाव में बदलाव किया. उत्तर-पश्चिम भारत के किसानों ने बाजरा और अन्य ऐसे मोटे अनाजों की खेती पर ज्यादा जोर देना शुरू किया जो कम पानी में और विषम परिस्थितियों में भी उग सकते थे.
खानपान और पहनावा बदला
भीषण ठंड ने भारतीयों के खान-पान और पहनावे को बदल दिया था. मुगल दरबार में ‘पश्मीना’ और भारी रेशमी कपड़ों का चलन बढ़ गया. रईस लोग सर्दियों में विशेष ‘चोगा’ और ‘अंगरखा’ पहनते थे. ठंड से बचने के लिए गर्म मसालों, सूखे मेवों और केसर का उपयोग खाने में बढ़ा.
बर्फ का व्यापार होने लगा
उस समय हिमालय से बर्फ काटकर नावों के जरिए दिल्ली और आगरा लाई जाती थी ताकि गर्मियों में शाही परिवार को राहत मिल सके. मुगल बादशाहों ने ‘बर्फ-खानों’ यानि आइस हाउसेज का निर्माण करवाया.
क्यों आयी ‘लिटल आइस एज’
वैज्ञानिक मानते हैं कि इस लिटल आइस एज आने की तीन वजहें थीं1. सौर गतिविधियों में कमी – सूर्य की ऊर्जा हमेशा एक जैसी नहीं रहती. 1645 से 1715 के बीच ‘माउंडर मिनिमम’ नामक एक दौर आया, जिसमें सूर्य की सतह पर सनस्पॉट्स की संख्या करीब शून्य हो गई. इससे सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा कम हो गई, जिससे पृथ्वी का सुरक्षा कवच कमजोर पड़ा और तापमान गिरने लगा.
2. भीषण ज्वालामुखीय विस्फोट – 17वीं से 19वीं सदी के बीच दुनिया में कई बड़े ज्वालामुखीय विस्फोट हुए. इनसे निकलने वाली भारी राख और सल्फर डाइऑक्साइड गैस स्ट्रेटोस्फीयर में फैल गई. इसने एक ‘छाते’ की तरह काम किया. सूरज की रोशनी को धरती तक पहुंचने से रोक दिया, जिससे कई सालों तक गर्मियां आईं ही नहीं.
3. महासागरीय धाराओं में परिवर्तन – यूरोप और अटलांटिक महासागर में समुद्री धाराओं का मार्ग बदलने से गर्मी का वितरण रुक गया. इसका प्रभाव वैश्विक वायुमंडल पर पड़ा, जिससे भारतीय मानसून कमजोर हो गया. उत्तर भारत की हवाएं अधिक ठंडी हो गईं.
ये हिमयुग खत्म कैसे हुआ?
19वीं शताब्दी के मध्य यानि करीब 1850 के बाद लिटल आइस एज का प्रभाव कम होने लगा. तापमान फिर से बढ़ने लगा. इसकी दो बड़ी वजहें थीं.1. प्राकृतिक चक्र – सूर्य की गतिविधियां फिर से सामान्य होने लगीं. सनस्पॉट्स वापस आने लगे. ज्वालामुखीय राख भी वायुमंडल से साफ हो गई.2. औद्योगिक क्रांति – यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है. 1850 के आसपास दुनिया में औद्योगिक क्रांति शुरू हुई. कोयले और जीवाश्म ईंधन के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों का स्तर बढ़ने लगा. इसने ‘प्राकृतिक वार्मिंग’ को ‘मानव-जनित वार्मिंग’ में बदल दिया, जिससे लिटल आइस एज हमेशा के लिए खत्म हो गया.
वैसे 300 साल पहले का वह दौर हमें सिखाता है कि पृथ्वी की जलवायु कितनी संवेदनशील है. आज हम उस दौर के ठीक विपरीत ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के दौर में हैं. जहां तब नदियां जमने की कगार पर थीं, आज हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं.



