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‘रेप का आरोपी प्रभावशाली तो’, CJI के सवाल पर SG ने कैसे समझाया? उन्‍नाव केस में सेंगर की बढ़ी मुश्किलें

नई दिल्ली. पूर्व विधायक कुलदीप सेंगर से जुड़े उन्नाव रेप में CJI सूर्यकांत की बेंच के सामने आज जब CBI की ओर से सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता सुप्रीम कोर्ट में खड़े हुए तो उनकी दलीलों में उस मासूम बच्ची की चीखें और इंसाफ की बेताबी साफ झलक रही थी. SG मेहता ने दो टूक शब्दों में कहा कि एक बाहुबली विधायक ने अपनी प्रभुत्वशाली स्थिति का फायदा उठाकर जो गुनाह किया उसे किसी भी सूरत में लोक सेवक की तकनीकी परिभाषाओं में उलझाकर कम नहीं किया जा सकता. अदालत के भीतर सवाल-जवाब का सिलसिला किसी कानूनी थ्रिलर से कम नहीं था. जब कोर्ट ने लोक सेवक की भूमिका पर सवाल किया तो SG ने साफ कहा, “कांस्टेबल हो या सेना का अफसर, अगर वो वर्दी और रुतबे की आड़ में नाबालिग से दरिंदगी करे तो कानून उसे कतई नहीं बख्शता.” सीबीआई ने साफ कर दिया कि वे उस बच्ची के प्रति जवाबदेह हैं और हाईकोर्ट के सजा निलंबन वाले आदेश पर तुरंत रोक लगनी चाहिए. सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम स्टे लगा दी.

आज सुप्रीम कोर्ट में क्‍या कुछ हुआ?SG तुषार मेहता (CBI): आरोपी को ट्रायल कोर्ट ने 15 वर्ष, 10 महीने और 13 दिन की सजा दी है. यह फैसला तथ्यों पर आधारित है. आरोपी निश्चित रूप से बलात्कार का दोषी है और पिछले 7 वर्षों से वह लोक सेवक (Public Servant) नहीं है.

CJI सूर्यकांत: क्या आपका तर्क यह है कि जब पीड़िता नाबालिग हो तो लोक सेवक की अवधारणा लागू ही नहीं होती?

SG तुषार मेहता: जी हां. IPC की धारा 376 के तहत यदि रेप किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया है जो प्रभुत्वशाली स्थिति में है तो न्यूनतम सजा 20 वर्ष या आजीवन कारावास है.

CJI सूर्यकांत: आप कह रहे हैं कि यह मामला धारा 376(2)(i) के तहत आता है? यदि पीड़िता नाबालिग न भी हो, तब भी क्या न्यूनतम सजा का यही प्रावधान लागू होगा?

SG तुषार मेहता: अब कानून में संशोधन हो चुका है, जिसके तहत न्यूनतम सजा 20 वर्ष है.

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी: लेकिन अपराध के समय यह संशोधन लागू नहीं था. उस वक्त की स्थिति के अनुसार ही प्रावधान लागू होंगे.

CJI सूर्यकांत: क्या आप यह कहना चाहते हैं कि यदि पीड़ित नाबालिग है तो लोक सेवक की अवधारणा अप्रासंगिक (Irrelevant) हो जाती है?

SG तुषार मेहता: जी, अब पोक्सो (POCSO) की धारा 4 में प्रावधान है. यदि कोई व्यक्ति पीड़ित पर हावी स्थिति में हो, तो अपराध और गंभीर हो जाता है. उदाहरण के लिए यदि कोई कांस्टेबल या सेना अधिकारी ड्यूटी के दौरान ऐसा कृत्य करता है तो वह गंभीर यौन उत्पीड़न का दोषी होगा.

CJI सूर्यकांत: तो आपके अनुसार, लोक सेवक वही है जो उस समय प्रभुत्वशाली स्थिति में हो? जैसे कोई विधायक से मदद मांगने आए और वह अपनी स्थिति का फायदा उठाए तो क्या वह गंभीर अपराध माना जाएगा? क्या लोक सेवक की परिभाषा को सख्ती से कानून के हिसाब से देखें या सामाजिक स्थिति के आधार पर?

SG तुषार मेहता: लोक सेवक की अवधारणा यहां लागू होती है. अगर तर्क के लिए मान भी लें कि वह लोक सेवक नहीं है तब भी वह धारा 5(3) के दायरे में आएगा. हम उस बच्ची के प्रति जवाबदेह हैं. मैं अदालत से आग्रह करता हूं कि विवादित आदेश (High Court का आदेश) पर तुरंत रोक लगाई जाए.

CJI सूर्यकांत: हम इस आदेश पर रोक लगाने के पक्ष में हैं.

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