ICMR की चेतावनी के बाद भी नहीं चेते आप तो पछताएंगे! सुधार लीजिए आदत, इस मौसम के लिए तो और खास है ये बात

बीमारियों और इंफेक्शन को जल्द से जल्द ठीक करने के लिए इंसान दवाओं के भरोसे रहता है. हॉस्पिटल में जाकर इलाज करवाता है. खासकर, कोई गंभीर इंफेक्शन होने पर मरीज को कई तरह की दवाओं के साथ एंटीबायोटिक्स भी दिए जाते हैं. लेकिन, एक हालिया रिपोर्ट में चौंकाने वाली बात सामने आई है. इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुछ कॉमन इंफेक्शन का इलाज अब काफी मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि प्रतिदिन इस्तेमाल होने वाली कई एंटीबायोटिक्स अपना असर तेजी से खोती जा रही हैं. कॉमन इंफेक्शन जैसे निमोनिया, यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI), सेप्सिस, डायरिया आदि बीमारियों का इलाज अब काफी मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि एंटीबायोटिक्स का असर सही से नहीं हो रहा है.
क्या कहती है ICMR की रिपोर्टटीओआई में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, ICMR की 2024 की वार्षिक रिपोर्ट एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस रिसर्च एंड सर्विलांस नेटवर्क (ARRSN) के अनुसार, हॉस्पिटल में सबसे अधिक मिलने वाले बैक्टीरिया पर कार्बापेनेम्स, पिपेरासिलिन–टैज़ोबैक्टम, फ्लुओरोक्विनोलोन्स, थर्ड-जनरेशन सेफालोस्पोरिन्स जैसी कॉमन मेडिसिन अब पहले जैसी कारगर नहीं रहीं.
देश के कुछ बड़े हॉस्पिटल से एक लाख लैब में टेस्टेड पॉजिटिव सैंपल के आधार पर इस रिपोर्ट को तैयार किया गया है. ड्रग-रेसिस्टेंट ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया सबसे अधिक हावी है. इसमें UTI, पेट और ब्लडस्ट्रीम इंफेक्शन के लिए जिम्मेदार बैक्टीरिया E. coli अब मज़बूत ऐंटीबायोटिक्स के प्रति भी कमजोर प्रतिक्रिया दिखा रहा है. Klebsiella pneumoniae, जो निमोनिया और सेप्सिस का बड़ा कारण है, लगभग तीन-चौथाई मामलों में पिपेरासिलिन–टैज़ोबैक्टम के प्रति और ज़्यादातर सैंपल में कार्बापेनेम्स के प्रति प्रतिरोधी पाया गया. इस कारण से इलाज के विकल्प बेहद सीमित रह जाते हैं. आईसीयू में हालात अधिक गंभीर हैं.
Acinetobacter baumannii में 91% मरीज़ों में मेरोपेनेम के प्रति प्रतिरोध पाया गया, जिसकी वजह से डॉक्टर्स को अधिक टॉक्सिक या जटिल दवाओं का सहारा लेना पड़ रहा है. Pseudomonas aeruginosa में भी प्रतिरोध लगातार बढ़ रहा है. हालांकि, कहीं-कहीं स्थिति में थोड़ी बहुत सुधार दिखी है जैसे E. coli का एमिकैसिन और कुछ सेफालोस्पोरिन्स पर बेहतर रिस्पॉन्स देखा गया है, लेकिन समग्र स्थिति बिगड़ती ही जा रही है.
डायरिया पैदा करने वाले बैक्टीरिया में भी फ्लुओरोक्विनोलोन्स और सेफालोस्पोरिन्स के प्रति भारी प्रतिरोध देखा गया है. 95 प्रतिशत से अधिक Salmonella typhi सैंपल फ्लुओरोक्विनोलोन्स के प्रति प्रतिरोधी पाए गए. फंगल इंफेक्शन में Candida auris लगभग 10 प्रतिशत मामलों में दवाओं के प्रति प्रतिरोधी निकला, जबकि Aspergillus के एक-तिहाई नमूनों में एम्फोटेरिसिन-B के प्रति प्रतिरोध मिला.
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अब भारत में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक्स अपना असर खो रही हैं, जो गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए चिंता की बात है. यदि एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल सही तरीके और जिम्मेदारी से नहीं किया जाता है तो आने वाले समय में एक कॉमन इंफेक्शन का इलाज भी करना बेहद मुश्किल हो सकता है.
टीओआई को दिए एक इंटरव्यू में मैक्स हॉस्पिटल (साकेत) के इंटरनल मेडिसिन निदेशक डॉ. रोमेल टिक्कू ने कहा कि अब ऐसी स्थिति हो गई है कि एक मजबूत और बेहद प्रभावी एंटीबायोटिक्स भी उन इंफेक्शन्स पर पॉजिटिव असर नहीं कर पा रही हैं, जिन्हें पहले आसानी से ठीक कर लिया जाता था. यह एक गंभीर पब्लिक-हेल्थ चेतावनी है. ऐसे में बेहद जरूरी है कि एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल के लिए कुछ सख्त नियम तय किए जाएं और इंफेक्शन की रोकथाम के लिए कुछ उचित उपाय किए जाएं.



