India Bangladesh Relations | Muhammad Yunus : क्या बांग्लादेश में यूनुस-जमात गठजोड़ को ‘अलग-थलग’ कर रहा है भारत? तीन दिन में मिले 3 सिग्नल

नई दिल्ली. बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के निधन के बाद भारत ने जिस तरह के सधे हुए कूटनीतिक कदम उठाए हैं, उसने साउथ एशिया के रणनीतिक हलकों में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. क्या नई दिल्ली नोबेल विजेता और बांग्लादेश के अंतरिम नेता मुहम्मद यूनुस और उनके कट्टरपंथी जमात साथियों को अलग-थलग करने की तैयारी कर रहा है? संकेत मिल रहे हैं कि भारत बांग्लादेश में अब लोकतांत्रिक और उदारवादी ताकतों को समर्थन देने का मन बना चुका है. यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब बांग्लादेश की सबसे लंबे समय तक पीएम रहीं शेख हसीना नई दिल्ली में निर्वासन में हैं और ढाका की सत्ता यूनुस समर्थित ताकतों के हाथ में है, जिन पर कट्टरपंथियों को बढ़ावा देने के आरोप लग रहे हैं.
खालिदा जिया के निधन के बाद भारत ने औपचारिक प्रोटोकॉल से आगे बढ़कर कदम उठाए, जो काफी अहम हैं. पहला, पीएम मोदी का संदेश…. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल शोक व्यक्त किया, बल्कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के वर्तमान नेता तारिक रहमान को सीधे पत्र लिखा. पीएम मोदी ने अपने संदेश में खालिदा जिया को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक हस्ती बताया, जिनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. दूसरा, विदेश मंत्री एस. जयशंकर खुद ढाका गए, पीएम मोदी का पत्र सौंपा और तारिक रहमान से चर्चा की. और तीसरी बात, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दिल्ली स्थित बांग्लादेश उच्च आयोग जाकर शोक पुस्तिका में हस्ताक्षर किए और लिखा कि भारत इस दुख की घड़ी में बांग्लादेश के लोगों के साथ है.
यह हाल के वर्षों में दुर्लभ है जब भारत ने बीएनपी के नेतृत्व के साथ इतने उच्च स्तर पर संपर्क किया है. बता दें कि बीएनपी पारंपरिक रूप से शेख हसीना की आवामी लीग की विरोधी रही है और इसे भारत विरोधी माना जाता रहा है.
आखिर भारत ने बीएनपी से संपर्क क्यों साधा?
भारत की यह चाल मजबूरी और स्ट्रेटजी दोनों का मिश्रण है. मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग की राजनीतिक गतिविधियों पर रोक लगा दी है. इसका मतलब है कि हसीना की पार्टी आगामी चुनाव नहीं लड़ पाएगी. ऐसे में बीएनपी ही बांग्लादेश में एकमात्र बड़ी पार्टी बची है जो पूरे देश में लोकतांत्रिक आधार रखती है.
दूसरी तरफ, यूनुस की सत्ता को जमात-ए-इस्लामी और कट्टरपंथी छात्र संगठनों का समर्थन प्राप्त है. जमात पर लगा प्रतिबंध हटा लिया गया है और देश में इस्लामी हमलों में बढ़ोतरी हुई है. ऐसे में भारत को एक लोकतांत्रिक विकल्प की तलाश थी, जो BNP के रूप में दिखा.
भारत के तीन बड़े संदेश
भारत बांग्लादेश के लोकतांत्रिक नेताओं के साथ खड़ा है, भले ही अतीत में उनके साथ रिश्ते जटिल रहे हों. भारत यह दिखा रहा है कि वह केवल एक गुट (आवामी लीग) तक सीमित नहीं है.
यह मुहम्मद यूनुस के लिए एक चेतावनी है. भारत यूनुस की जमात-ए-इस्लामी के साथ बढ़ती नजदीकी और कट्टरपंथी लामबंदी से खुश नहीं है.
भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि बांग्लादेश वैचारिक रूप से अस्थिर न हो. BNP से संपर्क करके भारत ने खुद को एक हितधारक के रूप में पेश किया है जो वहां कट्टरपंथ को हावी नहीं होने देगा.
‘बंगाली पाकिस्तान’ बनने का डर
भारतीय रणनीतिकार इस बात से चिंतित हैं कि यूनुस बांग्लादेश को उसी रास्ते पर ले जा रहे हैं जिसे 1971 में बंद कर दिया गया था. 1971 में बांग्लादेश ने पाकिस्तान की इस्लामी पहचान को ठुकराकर अपनी भाषाई और धर्मनिरपेक्ष पहचान को चुना था.आलोचकों का कहना है कि यूनुस बांग्लादेश को एक “बंगाली पाकिस्तान” बनाने का जोखिम उठा रहे हैं, जहाँ बंगाली राष्ट्रवाद को कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा के नीचे दबाया जा रहा है.
सेना प्रमुख की बातचीत और नरम पड़े तेवर
भारत का दबाव केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि सुरक्षा के स्तर पर भी है. भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अपने बांग्लादेशी समकक्ष वकर-उज़-ज़मां से बात की. इसे स्पष्ट सुरक्षा बातचीत बताया गया. इस बातचीत का असर यह हुआ कि ढाका से भारत के खिलाफ जो तीखी बयानबाजी हो रही थी, वह अचानक कम हो गई. यह दर्शाता है कि भारत शोर मचाने के बजाय शांति से स्थिति को स्थिर करने की कोशिश कर रहा है.
भारत की रेड लाइन और चिंताएं
भारत के लिए बांग्लादेश सिर्फ एक पड़ोसी नहीं, बल्कि सुरक्षा का एक अहम पिलर है. भारत की स्पष्ट रेड लाइन्स हैं.
जमात-ए-इस्लामी की मुख्य सत्ता में वापसी भारत को मंजूर नहीं.
बांग्लादेश की पहचान को धार्मिक-राष्ट्रवादी सांचे में ढालने की कोशिश का विरोध.
1971 के राजनीतिक मूल्यों (धर्मनिरपेक्षता) के साथ छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं.
बिना कहे आइसोलेट करने की रणनीति?
भारत ने सार्वजनिक रूप से मुहम्मद यूनुस की आलोचना नहीं की है और अपनी भाषा बहुत संयमित रखी है. लेकिन रणनीतिकारों का मानना है कि भारत कूटनीति के जरिए यूनुस और जमात के गठबंधन को कमजोर कर रहा है. तारिक रहमान और BNP को सम्मान देकर और सुरक्षा एजेंसियों से संपर्क बनाए रखकर, भारत ने साफ कर दिया है कि वह चुपचाप तमाशबीन बनकर नहीं रहेगा. अगर बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष पहचान खतरे में पड़ती है, तो इसका सीधा असर भारत की सुरक्षा और सीमावर्ती राज्यों पर पड़ेगा, जो 1970 के दशक जैसा संकट पैदा कर सकता है. भारत इसे रोकने के लिए हर संभव कूटनीतिक चाल चलने को तैयार है.


